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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 34

From जैनकोष



सव्वत्थ अत्थि जीवो ण य एक्को एक्ककाय एकट्ठो ।

अज्झवसाणविसिट्ठो चिट्टदि मलिणो मल रजेहिं ।।34।।

जीव की प्रवर्तमानता―पूर्व और अपर भव के शरीरों में वही-वही एक जीव है । यह नहीं है कि जब-जब नवीन शरीर मिला तो उस शरीर के ही साधनों से उसमें नया जीव उत्पन्न हुआ । जीव वही है, वह नवीन-नवीन शरीर वर्गणावों को प्राप्त होता है, तिस पर भी शरीर के साथ जीव की तन्मयता नहीं है और एक नय से देखा जाय व्यवहार दृष्टि से तो इस देह के साथ जीव की एकता भी है । नय दो प्रकार के होते हैं―निश्चयनय और व्यवहारनय । केवल एक को निरखने वाला निश्चयनय होता है और एक को न निरखकर अनेक को निरखने वाला व्यवहारनय होता है । व्यवहारनय में बंधन संपर्क ये सब संबंध विदित होते हैं । निश्चय में चूंकि यह नय केवल एक को ही निरखता है इस कारण यह संबंध नहीं बन सकता । इस प्रकरण में एक अकेला भी देखते जावो और बंधन भी निरखते जाओ ।

जीव और देह की एकता और अनेकता―क्षीर और नीर की तरह यह जीव और देह व्यवहारदृष्टि से देखा जाय तो एकार्थ हैं, अभिन्न हैं । जैसे जो स्तनों से दूध निकलता है उसही दूध में दूध भी है और पानी भी है । दूध निकालने के बाद पानी मिलाया जाय उसकी बात नहीं कह रहे हैं किंतु जो दूध निकलता है उस दूध में दूध भी है और पानी का अंश भी है, दोनों मिले हुए हैं अथवा दूध निकलने के बाद पानी डाल दिया तो वे दूध और पानी एकमेक हो जाते हैं व्यवहारदृष्टि में । वहाँ यह नहीं है कि एक गिलास में ऐसा दूध हो तो नीचे दूध-दूध हो और ऊपर के आधे गिलास में पानी हो या नीचे पानी हो और ऊपर के अर्द्ध भाग में दूध हो ऐसा तो नहीं है । वह जैसे एकमेक मिला हुआ है इस ही प्रकार यह जीव और यह देह भी एकमेक इस संबंध में है ।

जीव की व्यापकता―यह जीव पूरे देह में है, इस देह के किसी हिस्से में ही नहीं है, समस्त देह में जीव है और एक जीव की अनादि से अनंतकाल तक अथवा जब तक देह है, तब तक जितने भी देह मिले हैं सबमें यह जीव व्यापक रहा । अथवा एकेंद्रिय जीव से तो यह समस्त लोक खचाखच भरा हुआ है । यह जगह जहाँ हम पोल समझते हैं, इस जगह में कुछ नजर नहीं आ रहा है, पर उस जगह में एकेंद्रिय जीव ठसाठस भरे पड़े हुए हैं । जो जीव सर्वत्र भरे पड़े हैं उनका नाम निगोद है । ये निगोद वनस्पतिकाय के जीव हैं, ये अत्यंत सूक्ष्म हैं । कोई तो साधार होते हैं और कोई निराधार होते हैं । जो हरी वनस्पति के सहारे हैं निगोद वे तो साधार हैं और ये जो प्रत्येक वनस्पति के बिना सर्वत्र फैले हुए हैं ये निराधार हैं । निराधार का अर्थ यह है कि वे किसी दूसरे जीव के शरीर के आधार पर नहीं हैं । उन निगोद जीवों का कोई एक शरीर है जिस शरीर के आधार निगोद ही निगोद हैं । वहाँ प्रत्येक वनस्पति नहीं हैं । यों एकेंद्रिय जीव से भरा हुआ यह समग्र लोक है ।

जीवसमूह की एकरूपता व नानारूपता―वह जीवसमूह यद्यपि केवलज्ञानादिक गुणों की दृष्टि से एकरूप है तो भी वे नानारूप हो गये हैं शरीर भेद से । जैसे नाना रंग वाले कपड़े में रखा हुआ स्वर्ण-स्वर्ण तो वह एक ही प्रकार का है, पर भिन्न-भिन्न रंग के वस्त्र में पड़ा है, ऐसे ही यह जीव अपने आपमें तो एक ही प्रकार का है । हम हैं, आप हैं, सबमें स्वरूपदृष्टि से एकरूपता है इस जीव में, किंतु देह के संपर्क से इसमें यह नानारूपता बन रही है, और अज्ञान साथ छाया है सो इसे अपना कुछ नहीं दिखता । यह मायारूप इंद्रजाल ही सब कुछ नजर में आता है । यह जीव एक देह को छोड़कर नवीन देह में क्यों उत्पन्न होता है? इसमें रागद्वेष मोह लगा है, शरीर के अपनायत की बुद्धि इसमें पड़ी है । उन रागद्वेष भावों से मलिन होकर कर्मरज से यह ऐसी चेष्टा करता है कि एक देह को छोड़कर नवीन देह को ग्रहण करता है । यह आत्मा संसार अवस्था में क्रम से होने वाले अंतर के जो नाना शरीर मिलते रहे हैं उनमें जो ही एक शरीर में रह रहा है वही जीव क्रम से अन्य शरीर में चलता है ।

शाश्वतता का स्मरण―हम आपकी सत्ता अनादि से है, कुछ इस भव में आकर अब से हम आपकी सत्ता नहीं हुई है, हम अनादि से हैं और इस देह को त्यागकर भी हम आगे रहेंगे । हमारा सत्त्व शाश्वत है, पहिले भी था, आगे भी रहेगा । अब यह देखो कि इस पहिले के समस्त काल के सामने और भविष्य के समस्त काल के सामने यह 50, 60, 70 वर्ष का जीवन कितना अनुपात रखता है? एक बड़े लाखों करोड़ों अरबों योजन वाले समुद्र में एक बूंद जितने अनुपात में आता है उतने अनुपात में भी यह हम आपका 100-50 वर्ष का जीवन नहीं है । समुद्र में एक बूँद का तो कुछ हिसाब हो गया, पर इस अनंतकाल के सामने 100 वर्ष के जीवन का कुछ भी हिसाब नही है । कहीं लेख में ही नहीं आता । इतने थोड़े काल में पाये हुए इन सब समागमों में इतने काल तो हम माया में मुग्ध न हों ।

निर्मोहता का साहस―भैया ! ऐसा साहस बनायें कि जब इस व्यतीत हुए अनंतकाल में अनेक समागम पाये, वे भी नहीं रहे तो वर्तमान में जो भी समागम मिले हैं उनमें मुग्ध न हों, क्योंकि ये समागम भी शीघ्र ही बिछुड़ जायेंगे । जो भी पहिले पाये हुए समागम हम आपने छोड़े वे चाहे अपने आप छूट गये हों, चाहे जबरदस्ती छोड़ने पड़े हों, पर वे छूटे कि नहीं? तो जब हमने अनंत भवों के बड़े-बड़े वैभव समागमों का भी ख्याल छोड़ दिया तो कुछ गिनती में भी न आ सकने वाले इस 50, 60, 70 वर्ष के जीवन में हम परपदार्थों का मोह न करें तो हम अपूर्व आत्मीय चमत्कार प्राप्त कर सकते हैं । चमत्कार क्या? निराकुलता, शांति ।

धर्मध्यान की पद्धतियां―धर्मध्यान 4 प्रकार के बताये गये हैं, आज्ञाविचय―भगवान की आज्ञा मानकर धर्मसेवन करें । भगवान के वचन हम पाल रहे हैं, मंदिर आ रहे हैं, शास्त्र सुन रहे हैं, व्रत पाल रहे हैं, भगवान का वचन है । भगवान के वचन झूठ नहीं होते, ऐसी आज्ञा मानकर धर्मपालन में लगना, यह भी एक धर्मध्यान का तरीका है । कुछ गहरा चिंतन करना, मेरा स्वरूप क्या है, ये रागादिक भाव बैरी बनकर, मुझमें ही स्थित होकर मुझे ही बरबाद कर रहे हैं, इनका विनाश हो । रागद्वेष के विनाश में ही अपना कल्याण है, आदिक चिंतन करना, यह भी धर्मध्यान की पद्धति है, और कर्मों का फल विचारना―ये सब जीव स्वत: तो शुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं, पर कर्म संपर्क में क्या-क्या स्थिति बन रही है जीव पर? कैसे-कैसे फल बड़े-बड़े पुरुषों को भी भोगने पड़े हैं, ये कर्म बड़े दुर्निवार हैं आदिक कुछ भी चिंतन करना, यह भी एक पद्धति है, और स्पष्ट उत्कृष्ट एक पद्धति है जिसका नाम है संस्थानविचय । तीन लोक और तीन काल की बातें परोक्षरूप से जानना, हम समझते हैं कि इसे अपने उपयोग में लिए रहें, यह धर्मध्यान की उत्कृष्ट पद्धति है । इसमें क्या प्रभाव है? जब हमारी दृष्टि में तीन लोक की रचना बनी रहे, अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक, इनका विस्तार कैसे-कैसे जीवसमूह और काल की बात समाई रहे, कितना काल बीता, कितना काल बीतेगा, वर्तमान में कितना काल है, यह काल और लोकं की बात सामने रहे तो उसको व्यसन, पाप, दुर्भावना, कुवासना को अवसर नहीं मिल सकता । यह एक बड़ी विशिष्ट पद्धति है । और इस पद्धति का पूर्ण अधिकार साधुजनों को बताया है ।

बहिरात्मा का मुख्य कार्यक्रम―यह जीव यद्यपि शुद्ध निश्चयनय की दृष्टि से केवलज्ञान, केवलदर्शन स्वभाव वाला है तो भी अनादिकाल से कर्मबंधन के वश से मिथ्यात्व रागादिक विभावरूप परिणमन के कारण द्रव्य कर्ममलों से वेष्टित होकर इनका काम केवल एक रह गया बस, एक शरीर छोड़ना दूसरा शरीर पाना । इस संसारी जीव का मुख्य प्रोग्राम क्या है, मुख्य कार्यक्रम क्या है इसको खूब निरख लें । सर्वत्र देख लो, संसारी जीव का यही एक धंधा लगा हुआ है, जन्म लिया, थोड़ा-सा जिंदा रहे, कुछ भी गिनती नहीं कि वह कितना सा समय है? जन्म लिया और मर गये । देखिये जैसे कोई लंबा-चौड़ा है, मान लो ताड़ का पेड़ है, उस पेड़ के ऊपर कोई फल लगा है, वहाँ से फल टूटे और जमीन पर आये तो यह बतलावो कि बीच में कितना सा समय लगेगा? बिल्कुल थोड़ा-सा समय लगेगा । यों ही जन्म को तो समझ लीजिए । अपनी जगह से टूटने की स्थिति के निकटपूर्व की दशा और मरण को समझ लीजिए उस जगह पर गिरने की स्थिति । तो इस जन्म और मरण के बीच में कितना सा समय लगेगा? बिल्कुल थोड़ा-सा । तो इस संसारी जीव का मुख्य प्रोग्राम एक ही है―जन्म लेना और मरण करना ।

धर्म के लगाव का अनुरोध―भैया ! जरा दृष्टि तो दो अपने स्वरूप की ओर । अरे हमें फुरसत नहीं है, बहुत बड़ा काम लगा है । क्या काम लगा है? मरना और जन्मना । फुरसत नही है, और यहाँ भी देख लो कोई धैर्य नहीं रखता, कोई हित के लिए अवसर नहीं देता । बीमार हो जायेंगे तो दो महीना खाट पर पड़े रहेंगे, पर यह न होगा कि जितने समय हम हट्टे-कट्टे हैं, चलते-फिरते हैं, चलो उतना ही हिसाब लगा लें कि साल भर में दो महीना बीमार हुए तो, दो महीने के लगभग 1440 घंटे हुए, इतने घंटे बैठे रहे तो इतने ही घंटे सालभर में धर्म करने के लिए निकाल लें, ऐसा नहीं हो पाता । इकट्ठा दो महीने खाट पर पड़े रहने में ही भला लगता है। कुछ घटना घट जाय महीनों बेकार पड़े रहेंगे, फिर फुरसत रहती कि नहीं? और मृत्यु हो जाय तब तो फिर फुरसत ही फुरसत है । जितने समय तक हट्टे-कट्टे हैं, बुद्धि चलती है, कुछ ज्ञानदृष्टि कर सकते हैं उतने समय तक तो कुछ धर्म में समय लगावें । चौबीसों घंटे कोई कमाई भी तो नहीं करता है, किंतु मन की ऐसी स्वच्छंदता है कि मन को गप्पों में लगाते रहेंगे, फिजूल के कामों में मन को लगाते रहेंगे, पर ज्ञान के काम में, धर्म के काम में चित्त नहीं लगा सकते ।

देहविविक्तता―यह जीव अनेक देहों में बसकर भी अपने आपके स्वरूप में ही बसा करता है, देह में नहीं बस रहा है, इस बात को समझने के लिए आपका अनुभव प्रमाण होगा । आप अपनी दृष्टि को इस देह की ओर न लगाकर, अपने ख्याल में इस देह को न रखकर केवल एक ज्ञानप्रकाश मात्र मैं हूँ, ऐसी दृष्टि बनाकर रह जायें तो अपना यह अनुभव चल जायगा कि मैं देह से अत्यंत पृथक् हूँ, अत्यंत निर्मल हूँ इस देह से विविक्त निजस्वरूपमात्र अंतस्तत्त्व को दृष्टि में लेने से इन शरीरों के मिलने की जो परंपरा चल रही है वह भी समाप्त हो जायगी ।

प्रमाद का परिणाम―हम आपने आज मनुष्य शरीर पाया है । इस मनुष्य शरीर को पाकर हम आप घमंड बगराते हैं । अरे मगरमच्छ इत्यादि के शरीरों को तो देखो―और आप लोगों ने प्राय: मगर देखा ही होगा । कितना थूलमथूला अटपटा शरीर इन मगरमच्छ इत्यादि जीवों का होता है? ये जीव देखने में कितने अटपटे से लगते हैं, और भी अनेक प्रकार के कीड़ा-मकोड़ों में शरीर ऐसे देखने को मिलेंगे जो बेढब होते हैं, मगर इस जीव को ऐसा अटपट शरीर मिले वहाँ भी उसी तरह नाचता फिरता है, उसी शरीर में रमता है । चेते नहीं तो ये ही तो शरीर मिलने हैं । यह दो हाथ पैर वाला शरीर बार-बार नहीं मिला करता । कुछ अपने कल्याण की ओर भी आना चाहिए ।

धन का अमहत्त्व―भैया ! यह धन ही सब कुछ नहीं है । और सब कुछ क्या, कुछ भी नहीं है । इस धन के बिना भी तो गुजारा हो सकेगा । होता है बहुतों को देख लो । सम्यग्दृष्टि जीव चाहे भीख माँगकर पेट भर ले, पर वह धन को बड़ापन नहीं देता, परवस्तु का वह महत्त्व नहीं आंकता । यह तो एक परिस्थितिवश गुजारे की बात है । इस धन वैभव का महत्त्व देने से, इसकी चिंता में रहने से कुछ काम भी नहीं सरता । जिसके आना होता है, कुछ पता नहीं कि कहाँ से आता है? जिसके नहीं आना होता है, जाना होता है कुछ पता नहीं कहाँ चला जाय?

दृष्टांतपूर्वक वैभव की पुण्यानुसारिता का समर्थन―नारियल के फल में आप बतलावो पानी कहाँ से घुस जाता है? उसका बड़ा मोटा छिलका होता है, जिसमें सूई भी नहीं प्रवेश कर सकती, ऐसे उस मोटे छिलके वाले नारियल के बीच में पानी कहाँ से आ गया? उसे फोड़ते हैं तो उसके अंदर पानी निकलता है । और हाथी कैथ को खाले और दो-तीन दिन बाद उसे लीद में निकाल दे तो शायद देखा हो कहीं कि वह कैथ पूरा का पूरा निकल आता है, उस कैथ में कहीं भी छिद्र न मिलेगा, किसी ओर फटी रेखा तक न मिलेगा, और उसे हाथ से उठाकर देखो तो करीब दो तोले के वजन का वह निकलेगा । अरे जिस समय हाथी उसे निगल गया था तब तो वह करीब पाव भर का था । अब उसका सारा गूदा कहाँ से निकल पाया जब कि उसमें कोई छिद्र आदि भी नहीं है । तो जैसे नारियल के फल में पानी कहाँ से आ जाता है? कुछ पता नहीं, आ जाता है, ऐसे ही पुण्य के उदय में ये समागम कहां से आ जाते हैं? कुछ पता नहीं, आ जाते हैं । जैसे उस कैथ का रस कहाँ से निकल गया? पता नहीं, निकल गया, ऐसे ही पाप के उदय में इष्ट समागम कहां से खतम हो गया, निकल गया? पता नहीं । तो इस धन वैभव को इतना महत्त्व देना, उसकी चिंता करना, उसमें ही अपना समय बिता देना, यह विवेक की बात नहीं है । ज्ञानोपयोग बनायें, ज्ञानदृष्टि बनायें, इसमें ही आत्मा का लाभ है, इसमें ही आत्मा को शांति मिलेगी, निराकुलता होगी ।

उपादेय तत्त्व―यह जीवतत्त्व देह से अत्यंत पृथक् है, किंतु अनादि बंधन में कर्मलेप रहने के कारण नाना अध्यवसानों से विशिष्ट होने से यह कर्मजाल से मलीमस हो रहा है । जो इस जीव के विभाव में हो वही चेष्टा करता है । तब इसका फल यह है कि एक शरीर छोड़ा, नवीन शरीर ग्रहण किया । शरीर ग्रहण करना, छोड़ना, ग्रहण करना, छोड़ना, यही मुख्य कार्यक्रम संसारी जीव का बना हुआ है । इस प्रकरण से हम यह दृष्टि में लें कि देह से भिन्न ज्ञानादि गुण संपन्न जो शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व है वही सर्वप्रकार से उपादेय है, ये बाहरी समागम उपादेय नहीं हैं, लक्ष्य में ये बाहरी समागम लेने योग्य नहीं हैं । यह परिस्थिति है । परिस्थिति ही समझकर उनसे लिपटें, पर करने योग्य बात तो अपने आत्मा में शाश्वत प्रवर्तमान जो ज्ञानस्वभाव है, हमारा प्राण है, सहज स्वरूप है, उस स्वरूप को ही हम दृष्टि में लें, इसमें ही हमें शांति का उपाय मिलेगा । हम ज्ञान बढ़ाये, भेदविज्ञान करें, आत्मा की उपासना करें, इसमें ही हम आपकी भलाई है ।


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