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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 33

From जैनकोष



जह पउमरायरयणं खित्तं खीरे पभासयदि खीरं ।

तह देही देहत्थो सदेहमित्तं पभासयदि ।।33।।

दृष्टांतपूर्वक जीव की देहप्रमाणता का कथन―जैसे दूध में पद्मरागरत्न डाल दिया जाय तो वह समस्त दूध को अपने रंग रूप से प्रकाशित करता है, इसी प्रकार यह जीव देह में स्थित होकर अपनी देहमात्र को प्रभासित करता है । इस गाथा में जीव की देहप्रमाणता का वर्णन किया है । जैसे दूध में पद्यराग रत्न डाल दिया जाय तो जैसा उसका रूप है वही रूप समस्त दूध में फैल जाता है, इसी प्रकार यह जीव अनादिकाल से कषायों की मलिनता के कारण शरीर में रहता चला आया है । जब जिस शरीर में रहा तब अपने प्रदेश से उस शरीर में व्याप करके रहा।

एक देह में जीवप्रदेशों का संकोच विस्तार―जैसे उस ही दूध में पद्मराग पड़ा है और उसे गर्म करके चूल्हे पर रख दिया तो अग्नि के संयोग से वह दूध उबलने लगता है । मानो सेर भर पानी है तो वह डेढ़-दो सेर दूध जितनी जगह घेर लेता है । उस उफान में भी उस रत्न का रंग रहता है और जब अग्नि के कम हो जाने से उस दूध का उफान शांत हो जाता है तो वह रंग भी संकुचित हो जाता है । इस ही प्रकार इस शरीर में विशेष आहार देने आदि के कारण जब यह शरीर बढ़ता है तो जीव के प्रदेश भी फैल जाते हैं, और जब यह शरीर बुढ़ापे आदिक के कारण या आहार देने का सुयोग न होने के कारण दुर्बल होता है, घटता है तो ये जीव के प्रदेश भी संकुचित हो जाते हैं।

देहांतर में जीवप्रदेशों का संकोच विस्तार―जैसे वही पद्मराग रत्न एक बर्तन में से निकालकर किसी बड़े दूध वाले बर्तन में डाल दिया तो जो रंग पहिले थोड़े दूध वाले बर्तन में चमक रहा था वह बड़े बर्तन में फैलकर चमकने लगा । ऐसे ही यह जीव किसी छोटे शरीर को छोड़कर किसी महान शरीर में पहुंच जाता है तो अपने प्रदेशों के विस्तार से उस महान शरीर को व्याप लेता है । वही पद्मराग रत्न पहिले दूध वाले बड़े बर्तन से निकालकर छोटे बर्तन में थोड़े दूध में डाल दिया जाता है तो वह रंग प्रकाश संकुचित होकर उतने में ही फैलता है । ऐसे ही यह जीव बड़े शरीर से निकलकर छोटे शरीर में आया तो अपने प्रदेशों का संकोच करके अपने पाये हुए अणु शरीर में ही व्यापकर रह जाता है ।

जीव के आकार की सापेक्षता―इस जीव का आकार, चूंकि यह जीव भावात्मक पदार्थ है, इस कारण इसका स्वयं का स्वयं के कारण कोई आकार नहीं हो सका । जीव में आकार की प्रमुखता नहीं है, भावों की प्रमुखता है । कोई जीव के आकार का विचार बनाकर जीव के फैलाव को दृष्टि में लेकर क्या आत्मानुभव कर सकेगा? मैं जीव इतना बड़ा हूँ, पैरों से लेकर सिर तक इतने लंबे चौड़े मोटे विस्तार वाला हूँ, इस ही को नजर में रखिये और जीव के आकार को निरखकर आत्मानुभव किया जाय तो आत्मानुभव नहीं होता । मैं जाननमात्र हूँ, इस ज्ञानस्वभाव को दृष्टि में लिया जाय, यही एकमात्र उपयोग में रहे वहाँ आत्मानुभव हो जायगा । इसीलिए बताया है―ज्ञानं एवं आत्मा । जो ज्ञान है वही आत्मा है । इस जीव का आकार अनादिकाल से शरीर की अपेक्षा रहा आया है । जितने शरीर में यह जीव रहा उतने शरीर प्रमाण में यह जीव फैलता रहा, सिकुड़ता रहा । संसार अवस्था में यह जीव सदा देहप्रमाण रहा और मुक्त अवस्था में भी इस जीव के अपने ही सत्त्व के कारण कोई आकार नहीं बना, किंतु जिस देह से यह मुक्त हुआ है, जिस शरीर को छोड़कर यह सिद्ध भगवान बना है उस शरीर के परिमाण (बराबर) सिद्ध के आत्मा का परिमाण हुआ है ।

आत्मानुभव में स्वभावदृष्टि का वियोग―जीव का स्वरूप बताने के प्रसंग में आकार बताया जा रहा है, किंतु आत्मानुभव के लिए यह विषय मुख्य न बनेगा । जानकारी होना हर प्रकार जरूरी है । अपने आपके संबंध में अपनी सब जानकारी होनी ही चाहिए । सर्व प्रकार की जानकारी रखकर फिर यह अपने को ज्ञानमात्र अनुभव कर लेगा । कोई कहे कि इस जीव के बारे में और बातों की विचार करने की क्या जरूरत है? जीव कर्ता है भोक्ता है अथवा नहीं है, देह बराबर है, इतने प्रदेश हैं, इन सब बातों के समझने की क्या आवश्यकता है? आत्मानुभूति के लिये तो एक अपने को ज्ञानमात्र अनुभव कर लिया जाय, किंतु बात ऐसी होनी नितांत कठिन है । हम जीव के संबंध में जब बहुमुखी परिचय पायें तो हममें वह पात्रता जगेगी कि हम अपने को तब ज्ञानमात्र भावना में लेकर अनुभव कर सकें ।

देहों की संतति―इम जीव ने मिथ्यात्व रागादिक विकल्पों को कर-करके जो कर्म उपार्जित किया है, जिसमें शरीर नामक कर्म भी है, उसके उदय से जब जो शरीर मिला है उसके अनुकूल इसका विस्तार और उपसंहार होता है । यह जीव बड़ी से बड़ी देह की अवगाहना पाये तो एक हजार योजन लंबा, 500 योजन चौड़ा और 250 योजन मोटा महामत्स्य का शरीर पा लेता है और छोटे से छोटा शरीर पाये तो घनांगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण छोटा शरीर पा लेता है । घनांगुल का अर्थ है एक अंगुल लंबा, एक अंगुल चौड़ा और एक अंगुल मोटा, उसका असंख्यातवां भाग, अब सोच लो कितना छोटा होता होगा? इतना छोटा शरीर पा लेता है । इस जीव ने क्षेत्र परिवर्तन में इस अणु शरीर से एक-एक प्रदेश बढ़-बढ़कर क्रम से भी महामत्स्य की अवगाहना प्रमाण शरीर प्राप्त किया । इसमें यह तो नियम नहीं है ना कि जो शरीर पाया है उससे एक प्रदेश और बढ़कर फिर शरीर तुरंत मिले । कैसा ही शरीर मिले ? जब उससे एक प्रदेश बढ़कर कोई शरीर मिला तो उसे परिवर्तन में शामिल कर लिया। इतने शरीर इस जीव ने धारण किये और जब-जब जिस शरीर को पाया तब-तब उस शरीर को ही आत्मसर्वस्व माना ।

देह की घनिष्टता―हम आपको जो भी शरीर प्राप्त है उससे भी सुंदर मजबूत पुष्ट, रंगा चंगा और का शरीर दिख जाय तो उसमें आत्मीयता नहीं जगती, यह मैं हूँ ऐसी प्रतीति उसमें नहीं बनती और खुद का अधिष्ठित यह शरीर चाहे दुर्बल हो, काला हो, कुरूप हो उसमें आत्मीयता रहती है । किसी बुड्ढे से कहो कि तुम वृद्ध हो गये, तुम्हारे गाल बैठ गये, दाँत टूट गये, अब तुम कुरूप हो गये, तुम इससे मोह न करो । देखो यह अमुक का लड़का है, यह कितना सुंदर है, इससे मोह ममता कर लो तो उससे वह मोह ममता नहीं करता । वह तो अपने ही शरीर से मोह ममता करता है । उसे तो जैसा भी अपना शरीर मिला, वही रुचेगा । उसे ही अपना सर्वस्व मानेगा । यह सब क्यों हुआ? इस जीव के अज्ञान बसा हुआ है । इसे अपने ज्ञानस्वरूप की सुध नहीं है । अरे मैं जिस स्वरूप से रचा गया हूँ वह ज्ञानमात्र है । कितना पवित्र स्वरूप है, उसमें गंदगी का कहीं नाम नहीं है, न इसमें द्रव्यात्मक गंदगी है और न भावात्मक । अपने स्वरूप को निहारो, इस स्वरूप में अशुचिता का कहीं काम ही नहीं है ।

शुचिदर्शन बिना अशुचिभावना से असंतोष―हम आप अशुचि भावना भाया करते हैं, शरीर-शरीर पर ही दृष्टि रखकर भावना भाते हैं―हड्डी मल मूत्र पीप आदि इसमें सभी गंदे पदार्थ हैं । दिपै चाम चादर मढ़ी हाड़ पीजड़ा देह । भीतर या सब जगत में और नहीं घिन गेह ।। इस देह के बराबर घिनावना पदार्थ और कुछ नहीं है । मोह दशा में इस जीव को घिनावनी जगह में राग होता है । क्या यह बता सकते हो कि इस शरीर में सबसे अधिक घिनावने पदार्थ किस जगह हैं? सबसे अधिक घिनावने पदार्थ चेहरे में मिलेंगे, मुंह पर मिलेंगे । लार, थूक, कफ, नाक, आंख का कीचड़ कनेऊ ये सब गंदे पदार्थ इस चेहरे में ही हैं । लोक में व्यवहार इस चेहरे को देखकर ही बनता है, लोगों का आकर्षण चेहरे को देखकर ही होता है और इस चेहरे में अधिकाधिक मल भरे हुए हैं । यह सब वर्णन कर लेते हैं कि यह शरीर घिनावना है पर इतने से संतोष नहीं हो सकता । यह क्षणिक भावुकता है । थोड़ी देर को इस शरीर का घिनावनापन नजर में आया और थोड़ी ही देर बाद इस शरीर से बढ़कर है भी क्या दुनिया में, ऐसी वासना बना ली । कुछ विचारों का स्थायित्व नहीं रहता, शरीर को अपवित्र तो देखा पर यहाँ पवित्र भी कुछ है कि नहीं, इसे न देखा । अपने आत्मा का स्वरूप निरखो, यह शुचि है, पवित्र है, उत्कृष्ट है । जो अपने इस पवित्र स्वरूप को नहीं निहार पाता है, इसकी ओर विचार भी जो नहीं करता वह यह शरीर अपवित्र है, ऐसा गाता रहता है, वह संतोष नहीं पाता ।

शुचि तत्त्व की भावना―भैया ! शरीर तो अपवित्र है, मगर उसमें कुछ पवित्र भी है कि नहीं? यदि नहीं है पवित्र तो और भी उल्झन में डाल दिया । जो कुछ भी यहाँ दिख रहा है वह सब अपवित्र ही अपवित्र दिख रहा है । कहीं लोग बड़ी भीड़ में थोड़ी देर बैठ जायें, सभी लोग पसीने से लथपथ हो जायें तो इस शरीर की गर्मी से बदबू नजर आने लगेगी । तो जो अपवित्र ही अपवित्र निरख रहा है सब कुछ, कुछ पवित्र भी है इस शरीर में, इसको पहिचानता भी नहीं है तो वह तो और भी घबड़ा जायगा, इन विचारो ने और दुःखी कर डाला उसे । अरे शरीर की अपवित्रता जानना तो ठीक है, मगर अपने स्वरूप की पवित्रता का परिचय न हो तो संतोष कहाँ करेगा यह जीव? इस जीव का स्वरूप, इस जीव का स्वाभाविक विकास, उस विकास का सामर्थ्य तो इतना है कि तीन लोक तीन काल की समस्त द्रव्य गुणपर्यायें एक समय में ही प्रतिभास में ले लेता है, किंतु ऐसी समर्थ विशुद्ध शक्ति का श्रद्धान न होने से, चैतन्य चमत्कार मात्र शुद्ध जीवास्तिकाय का भान न होने से मिथ्यात्व कषाय रागद्वेष इन रूप परिणम रहा और इन परिणामों से जो जैसे कर्म उपार्जित किया उसके अनुसार शरीर, शरीर पर शरीर रचते चले जा रहे हैं ।

जीव और देह के विज्ञान से शिक्षण―अब इस प्रकरण में जीव देहप्रमाण मानकर जानकर क्या शिक्षा लें? यहाँ इतने संकोच विस्तार हो रहे हैं, कितनी पराधीनता है इस जीव की? मनुष्य कभी मरकर पेड़ बन जाय तो कैसी-कैसी शरण रहनी, पत्ते, फूल, फल आदिरूप में यह पसर जायगा । यह अमूर्त जीव ज्ञानदर्शन स्वभाव वाला जीव और कैसा-कैसा इसे पसरना पड़ा, यह आकृति की कितनी पराधीनता है? यद्यपि आकार जीव का कुछ भी रहे उससे जीव को बाधा नहीं है । जीव को बाधा तो दुःखरूप परिणाम हो तब होती है, लेकिन जीव जिनके अंग उपांग नहीं हैं या ऐसे विचित्र अंगोपांग हैं, वे उन शरीरों में रहते फिरते हैं, उनके मोह ममता तो है ही सो दुःख ही चल रहा है । क्लेश जीव के प्रदेशों के फैलने सिकुड़ने से नहीं है, क्लेश तो अपने विकारों से है, कल्पनावों से है । ऐसा उद्यम करना अपना कर्तव्य है कि इन शरीरों का प्राप्त होना ही समाप्त हो जाय, समाप्त नाम है भली प्रकार पूर्ण पा चुकना । बस पा चुके, अब पाने का काम नहीं रहा । जहाँ पाने का काम नहीं रहा, उसे कहते हैं समाप्त । ऐसा उद्यम करो कि जिससे शरीरों का मिलना ही समाप्त हो जाय । उसका उपाय है शरीररहित चैतन्यचमत्कार मात्र निज अंतस्तत्त्व का श्रद्धान बनायें, उपयोग बनायें और ऐसे ही ज्ञान में अपने को रमा दें तो यही सर्व संकटों के विनाश का उपाय है ।

स्वतत्त्व और परतत्त्व के प्रयोग में लाभालाभ―भैया ! अन्य-अन्य पदार्थों को उपयोग में लेने से कोई लाभ न मिलेगा, क्योंकि वे सब बाह्यपदार्थ हैं, उनको दृष्टि में लेने से इस जीव को निर्विकल्प स्थिति न प्राप्त होगी । निर्विकल्प ज्ञान होने से ही, प्रतिभासमात्र लेने से ही निर्विकल्पता जगेगी । यह मोह ममता कुटुंब धन वैभव जिनको पाकर हर्षमग्न हो रहे हैं, ये सब समागम इस जीव के विकार के, विपत्ति के कारण हैं । अतएव अहित करने वाले हैं । इन समागमों से जीव को कुछ भी लाभ नहीं है । अपने को लाभ तो अपने को शुद्ध सहज अपने आपमें जो स्वरूप है उतना मात्र अपने को श्रद्धान करने से ही मिलेगा । जिनसे मैं न्यारा हूँ उन तक का भी विकल्प न रक्खें । मैं सबसे न्यारा हूं―यह तो ज्ञान के कदम में पहिला कदम है और मैं मात्र ज्ञानस्वरूप हूँ, ऐसा उपयोग जगना यह उसके बाद का कदम है । ज्ञानानुभूति के लिए जिनसे मैं न्यारा हूँ उनका भी नाम मत लें, उन्हें ध्यान में मत लें । मैं न्यारा हूँ यह भी सुध न लें किंतु मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञानमात्र हूँ, ऐसी सुध लें, ऐसा ही उपयोग बनावें तो इस स्वरूप की दृष्टि से अपने को ज्ञान की अनुभूति होगी । देहप्रमाण जानकर यह ध्यान में लावें कि मैं ज्ञानमात्र हूँ । अभी तक भ्रमवश, नाना देह पाये, इन देहों से छूटकारा पाने में ही हमारा कल्याण है । अब मैं अपने स्वरूप को संभालूँ और देहों से छुटकारा पाने का यत्न करूँ ।


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