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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 4

From जैनकोष



जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा तहेव आयास।

अत्थित्तम्हि य णियदा अणण्णमइआ अणुमहता।।4।।

अस्तिकायत्व―इस गाथा में  अस्तिकायों की जाति के नाम बताये गये हैं, जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश। ये  अस्तिकाय हैं। ये अपने-अपने अस्तित्व में नियत है और अपने अस्तित्व से अभिन्न है, अर्थात् उनकी सत्ता सदा उनसे जुदी नहीं है। कहने में आता है कि जीव में अस्तित्व है पर इस तरह नहीं है जैसे कि मटके में दही है, मटका न्यारी चीज है, दही न्यारी चीज है, इस तरह न जानना कि जीव एक अलग बात है और उसमें अस्तित्व भरा है। जीव है इस ही विशेषता का नाम जीव का अस्तित्व है, जैसे इस पुस्तक में अस्तित्व क्या है? क्या यह पुस्तक से अलग हैं? तद्रूप है। तो सभी पदार्थ अपनी सत्ता में तन्मय है, इसमें जो अनेक प्रदेश हुये उन्हें अस्तिकाय कहते हैं, कालद्रव्य, सिर्फ एकप्रदेशी है, लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर एक-एक कालद्रव्य ठहरा है। यह एकप्रदेशी है और परमाणु भी एकप्रदेशी है लेकिन उसे अस्तिकाय में गिना है। कालद्रव्य भी एकप्रदेशी है, उसे अस्तिकाय में नहीं गिना। परमाणु एकप्रदेशी है उसे अस्तिकाय उपचार से गिना है, वास्तव में नहीं है, याने अनेक कालद्रव्य मिलकर एक स्कंध बन जायें यह नहीं हो सकता और अनेक परमाणु मिलकर एक स्कंध बन जायें यह हो जाता है तो स्कंधों की दृष्टि से पुद्गल को अस्तिकाय कह दिया।

विभावव्यंजनपर्याय में पृथक्-पृथक् अस्तिकायपना―जीव द्रव्य अर्थात् जो कुछ भी चैतन्यस्वरूप है वह जीव अस्तिकाय है। कैसा यह एक पिंडरूप विलक्षण पदार्थ है कि जो बिखरता नहीं है, चैतन्यस्वरूप है एक अखंड रहता है, चिदात्मक है, जिसमें ज्ञान का परिणमन चलता है और रागादिक भावों का भी परिणमन चलता है। कभी रागादिक भाव भी होते हैं जिनमें ये सब भावात्मक विकास विकार हो रहे हैं। वही जीव है जो-जो कुछ यह दृश्यमान है और जो दृश्यमान हो सकता है यह सब पुद्गल अस्तिकाय है जीव को जीव से कोई हानि नहीं होती। इस जीव में पुद्गल मिल जाय, जीव के विकार में पुद्गल तत्त्व आये तो उससे जीव की हानि है। जीव-जीव कई मिलकर एक पिंड में नहीं आते, पर जीव और पुद्गल ये मिलकर कभी एक पिंड में आ जाते हैं। यद्यपि परमार्थ दृष्टि से जीव में पुद्गल नहीं पुद्गल में जीव नहीं, पर बंधन दिख रहा है कि जीव, शरीर, कर्म ये तीनों पर्यायरूप में एक बंधन रूप हैं। पर एक जीव दूसरे जीव से मिलकर बंधन रूप हो जाय यह नहीं होता है।

जीवसंभ्रम―अब जीव का भ्रम देखिये। जीव कभी दूसरे जीव से एक हो नहीं सकता व्यवहार दृष्टि से भी। लेकिन इस जीव को जीव में मोह है। पुद्गल से बढ़कर जीव का जीव में मोह है, स्त्री पुत्रादिक में मोह है, तो घर वैभव सभी में मोह होना पड़ता है, तो जैसे जीव से कभी कुछ भी संबंध हो ही नहीं सकता, अत्यंत न्यारा रहता है उसमें कितना व्यामोह है, जीव को अन्य जीव में व्यामोह होने का कारण है कि इस जीव को अपने शुद्ध स्वरूप का परिचय नहीं है। यह अपने को भी यथार्थ जीवस्वरूप में मानता नहीं है, इसे खुद अपने आपमें भ्रम है। यह शरीररूप अपने को मानता है या जो विचार, विकल्प, तर्क, वितर्क उत्पन्न होते हैं उन रूप अपने को मानता है। कभी जड़ रूप भी अपने को मानता है। जब अपने स्वरूप का परिचय ही नहीं है तो उसे अपने में संतोष कैसे होगा जब संतोष इसे हो नहीं सका और संतोष इसे चाहिये है तो अब यह बाहरी पदार्थों में संतोष ढूंढ़ता है। बस उन बाहरी पदार्थों में हमारे सरीखे ये जीव हैं, जिनके वचन सुनकर प्रीति बढ़ाते हैं, और ये पुद्गलद्रव्य चूंकि ये हमारे इंद्रियज्ञान में आश्रय है, विषयसाधनों के आश्रय है अतएव इनमें मोह होता है अपने आपका परिचय न होना ही परपदार्थों में व्यामोह होने का कारण है। हम आपका निकट संबंध व्यावहारिक संबंध जीव और पुद्गल से है। धर्मद्रव्य की कौन खबर रखता है।

निष्क्रिय और सक्रिय द्रव्य का क्रिया का निमित्त―धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये विपरीत है जीव और पुद्गल से। जो क्रियाशक्ति हों वे दोनों द्रव्य है जीव और पुद्गल अन्य द्रव्य न चलते है न गति पूर्वक ठहरते है। जीव में क्रिया है और पुद्गल में क्रिया है। जीव और पुद्गल की क्रिया में जो उदासीन निमित्त है वह धर्मद्रव्य है। धर्मद्रव्य लोकाकाश में स्थिरता से व्याप्त है। जैसे पानी मछली को चलाने में सहायक है, पर पानी चलकर मछली को चलाने में सहायक हो सो नहीं। इस प्रकार धर्मद्रव्य पुद्गल के गमन में सहायक है, पर यह खुद चलकर जीव को चलाता नहीं है। धर्मद्रव्य अमूर्तिक है, खुद जानता नहीं है, ऐसा जीव नहीं है, धर्म में रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है इस कारण पुद्गल भी नहीं हे। पुद्गल होता है रूप, रस, गंध, स्पर्श वाला। यह धर्मद्रव्य अमूर्तिक है और अपने स्वरूप में निरंतर परिणमता रहता है। वह किस तरह परिणमता है यह बताने के लिए कोई शब्द नहीं है। आगम में बताया है कि षड्गुणवृद्धिहानि रूप से परिणमता है। एक यह वैज्ञानिक तथ्य है कि कुछ भी चीज किसी दूसरे रूप बदल तो उस बदल के समय बहुत उथल-पुथल होती है। अनेक बार वृद्धि और हानि होती है। एक सकल से दूसरी सकल तक पहुंचने में अनेक वृद्धि हानियां हो जाती हैं। वे कभी तो समझ में आती है कभी नहीं आती है। तो यों धर्मद्रव्य निरंतर प्रतिसमय परिणमता रहता है और उसका वह परिणमन अपने अगुरुलघुत्व वृद्धि हानिरूप है। केवल अंदाज से यह जान लो कि कोई भी चीज चाहे समान रूप परिणमे और चाहे असमान रूप परिणमे पर प्रत्येक परिणमन के लिये यह षड्गुण हानि वृद्धि होती है, एक बहुत बड़ी उथल-पुथल हो जाती है जो हम आपको विदित नहीं हो पाती।

धर्मास्तिकाय―अधर्मद्रव्य चलते हुये जीव पुद्गल के ठहरने में सहायक है। अधर्मद्रव्य का स्वभाव दूसरा है, धर्मद्रव्य का स्वभाव दूसरा है, पर जैसे धर्मद्रव्य अमूर्तिक है ऐसे ही अधर्मद्रव्य अमूर्ति है, जैसे धर्मद्रव्य लोकाकाश में व्याप्त है, ऐसे ही अधर्मद्रव्य लोकाकाश में व्याप्त है। जैसे धर्मद्रव्य का षड्गुण हानि वृद्धिरूप परिणमन है ऐसे ही अधर्मद्रव्य का षड्गुण हानि वृद्धिरूप परिणमन है। सारी बात एक समान होकर भी निमित्त भेद से भेद है। धर्मद्रव्य तो जीव और पुद्गल के गमन में सहकारी है और अधर्मद्रव्य जीव और पुद्गल को ठहराने में सहकारी है। ये पदार्थ ऐसे नहीं हैं कि इन्हें लोग जल्दी जान जाय इन्हें तो साधु संतों ने अपने ज्ञान से समझकर बताया है।

आकाशास्तिकाय―वां अस्तिकाय है आकाश। आकाश अवस्तु का नाम नहीं नथिंग नहीं, किंतु वह सत्तात्मक है। उसमें परिणमन है। उसका प्रदेश है। यों जल्दी दिखने में लगता है कि आकाश तो इस पोल का नाम है, जहां कुछ नहीं है, उसी का नाम आकाश है, पर आकाश कुछ नहीं का नाम नहीं है। आकाश अमूर्तिक है, अनंत प्रदेशी है। उसमें भी निरंतर परिणमन होता रहता है, वह सद्भूत चीज है। यह आकाश एक है, जितने आकाश के क्षेत्र में जीव पुद्गल आदि सभी द्रव्य रहते हैं उसका निमित्त है लोकाकाश। और जहां सभी द्रव्य नहीं हैं केवल वही आकाश है उसका नाम है अलोकाकाश।

लोकाकाश का प्रमाण―लोकाकाश का प्रमाण 343 घनराजू है। जहां हम बसते हैं यह जंबूद्वीप है। यह एक लाख योजन के विस्तार का है। 2 हजार कोश का एक योजन होता है, उससे दूना एक तरफ समुद्र है। समुद्र इस द्वीप को घेरे हुये है। सभी द्वीप समुद्र अपने-अपने पूर्ववर्ती द्वीप समुद्र को घेरे हुए है। उससे दूना द्वीप, उससे दूना समुद्र, उससे दूना द्वीप, उससे दूना समुद्र यों चलते जाते हैं, और ऐसे द्वीप समुद्र हैं अनगिनत। गिनती की जहां तक हद है अनुमान रूप से भी उससे भी ज्यादा। अब कितना विस्तार हो गया। इतना सारा विस्तार एक राजू अभी नहीं है एक राजू से थोड़ा कम है, ऐसा एक राजू तो एक ओर रहा एक ही राजू मोटा हुआ, एक ही राजू चौड़ा हुआ, एक राजू लंबा हुआ इतने का नाम है एक घनराजू। ऐसे-ऐसे 343 घनराजू प्रमाण लोक हैं और इससे बड़ा लोकाकाश है, जब कोई ठोस चीज है तो उस ठोस चीज का कहीं न कहीं अंत जरूर है। ठोस चीज असीम नहीं हो सकती। जब यह पृथ्वी ठोस है तो इसका कहीं अंत जरूर है। यह सारा विश्व समूह ठोस है। बीच में पोल भी है। यह ठोस चीज पड़ी हुई है तो इसका कहीं न कहीं अंत अवश्य है। जिसके आगे कोई ठोस न मिले उतना है लोकाकाश और उसके बाद है अलोकाकाश इस लोक में ठीक बीचोबीच एक त्रसनाली है। यह एक राजू प्रमाण मोटी, 14 राजू लंबी है इसके आसपास बाकी 343 में से 14 राजू घटाने पर 329 घनराजू जो बचता है क्षेत्र उसमें केवल स्थावर जीव हैं, त्रस जीव नहीं, उस त्रसनाली में जो ठीक मध्य क्षेत्र है असंख्यात द्वीप समुद्र वाला उसमें केवल ढाई द्वीप में मनुष्य है, उसके बाहर तिर्यंच है। ऐसी यह विराट रचना लोक की प्राकृतिक है।

लोक की स्वत:सिद्धता―इस लोक को कोई बनाने नहीं आता। अब यह बात समझ में नहीं आती तब लोग यह कह देते हैं, क्योंकि प्रभु अनंत सामर्थ्य वाला है ना, इसे भगवान ने बनाया। एक भगवान सारी दुनिया को बनाए और ध्यान रक्खे तो उसका तो बड़ी आकुलतापूर्ण काम हुआ किस-किसकी खबर रक्खे, किसको क्या करे और, बात यह है सही भी कि यह सब भगवान की सृष्टि है, पर इसको यों देखिये―जितने भी जीव हैं सब जीवों में भगवान बसा हुआ है। सभी कहते हैं, पर इन जीवों से न्यारा कोई एक भगवान इन सब जीवों में बसे ऐसा नहीं है, किंतु सब जीव चैतन्यस्वभावी है, भगवत्स्वरूप है। प्रत्येक जीव अपने स्वभाव और शक्ति में भगवान हैं। यह आत्माभगवान जब विकृत होता है तो निमित्त नैमित्तिक योग पूर्वक ऐसी सृष्टि हो जाती है जैसे कि हम आप बैठे हैं, तो यह है भगवान की ही लीला, पर यह आपमें आपके भगवान की लाला हममें हम भगवान की लाली है, और जब यथार्थ भेद विज्ञान पाता है तो उस ज्ञानप्रकाश में अपने को सबसे न्यारा निरखकर सुरक्षित बना लेता है, फिर इसकी लीला मोक्ष मार्ग की चलती है। कर्मों से शरीर से न्यारा होता हुआ यह पूर्ण केवल हो जाता है।

सामान्य और विशेष―इन सब पदार्थों में सामान्य और विशेष दोनों अस्तित्व देखो। केवल है कि निगाह से देखो तो इसमें सब पदार्थ आ गए। यह सामान्य अस्तित्व और नाम लेकर व्यक्तिगत बात आये तो वह विशेष अस्तित्व है। ये सभी पदार्थ निरंतर उत्पन्न होते है, निरंतर विलीन होते हैं और सदा बने ही रहते हैं। देखिये ये पदार्थ उस स्वरूप पड़े हुए हैं कि बनते हैं बिगड़ते हैं और बने रहते है। जैसे इसका उपादान, इसके निमित्त का सद्भाव अथवा अभेदरूप योग रहता है उस प्रकार से सभी पदार्थ परिणमते रहते हैं। परिणमन में क्या होता है? नई चीज बनना पुरानी चीज मिटना और वही का वही रहे। तो जब यह पदार्थ में ही स्वरूप पड़ा है फिर इसके रचने वाला कोई होगा यह विचारने की क्या आवश्यकता है। सभी पदार्थ स्वयं हैं। आपका आत्मा, यह अपने आप है। हम है, ऐसे नहीं कि हमारी सत्ता सदा न्यारी ही और हम न्यारे हों।

वर्णन की नयद्वयायत्तता―नय दो होते हैं―एक द्रव्ययार्थिकनय और दूसरा पर्यायार्थिकनय। जैसे कहते हैं जीव में ज्ञान भरा हुआ है तो क्या ऐसा है कि जैसे बोरे में गेहूं भरे हैं वैसा ज्ञान भरा है? क्या बोरे में गेहूं की तरह जीव ज्ञान भरा हुआ है? अरे जीव में तो ज्ञान लबालब भरा हुआ है और यह बात तो कहने की है कि जीव में ज्ञान भरा हैं। अरे जीव ज्ञान को ही कहते हैं। ज्ञानमय ही जीव है। आम में हरा रूप है तो क्या आम अलग चीज है, हरा अलग चीज है, अरे हरे रूप ही आम है, ऐसे ही जीव में ज्ञान अलग नहीं हैं। जीव ज्ञानमय ही है, जीव की सत्ता अलग नहीं है। सत्तामय ही जीव है। एक कहने का ढंग है। द्रव्यार्थिक दृष्टि तो अभिन्नता से प्रतिपादन होता है और पर्यायार्थिक दृष्टि भिन्नता से प्रतिपादित होती है। जीव में ज्ञान है यह पर्याय का कथन है और जीव ज्ञानमय है यह द्रव्य दृष्टिगत कथन है। जीव सत्तामय है यह द्रव्यदृष्टि का कथन है जीव में अस्तित्व है यह पर्यायदृष्टि का कथन है। पर्याय नाम भेद का है, द्रव्य नाम अभेद का है। जितने उपदेश होते हैं वे सब दोनों नयों के आधीन होते हैं। कोई द्रव्यदृष्टि का ही हठ कर ले अपने वर्णन में तो वह जैन पद्धति का उपदेश नहीं हे। पर्यायदृष्टि से अस्तित्व गुण कथन्चित भिन्न निरखे तो द्रव्यदृष्टि से तो अस्तित्व न्यारा नहीं है, किंतु यह पदार्थ स्वयं ही सत् होता हुआ अस्तित्व वाला है। सत्ता से सब अभिन्न है।

कायत्व का विवरण―ये जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश अस्तिकाय है। इस अंश में अस्तित्व का तो वर्णन किया और काय का अर्थ यहाँ बहुप्रदेशी है। यह अणुवों से महान है। संक्षिप्त अंश का समुदाय है। जैसे किसी का बुखार थर्मामीटर से मापा 101 डिग्री बुखार है तो उसका अर्थ हे कि बुखार में एक-एक अंश माना जाय तो ऐसे-ऐसे 101 अंश बराबर-बराबर हैं, मगर किसी का बुखार एक अंश भी बराबर रहा, कभी 50 अंश भी रहा, 90 अंश भी रहा फिर भी गर्मी का माप है। जिसके 101 डिग्री बुखार है उसमें एक अंश कुछ माप होता होगा। एक और एक मिलकर 2 अंश हो गये। इस प्रकार 101 अंश ऐसी ही जीव में असंख्यात प्रदेश हैं। कभी यह जीव एक दो आदिक प्रदेश रूप नहीं रह सकता। सदा असंख्यात प्रदेशी रहेगा। वहाँ प्रदेश का अर्थ है आकाश के एक छोटे हिस्से बराबर जिसमें केवल एक परमाणु रह सके, ऐसे-ऐसे असंख्यात प्रदेश हैं, मानो इस समय पैरों से लेकर सिर तक इतने लंबे चौड़े में हमारा आत्मा है। तो यह जीव कितना लंबा चौड़ा है, इसको कोई यह कहेगा कि यह 10 फुट का है वर्ग के हिसाब से तो उसमें एक फिट कुछ चीज है। एक फिट में एक इंच कोई माप है। एक इंच में एक सूत कोई माप है और एक सूत में भी अनगिनते माप हो माप हो सकते हैं। उनमें सबसे छोटा जो माप हो, जिसका कोई दूसरा भाग न हो सके उसका नाम एक प्रदेश है ऐसे-ऐसे अनगिनते प्रदेशों वाला यह जीव है। यही सब आगे बतावेंगे। यों प्रदेश समूह रूप होने का नाम है अस्तिकाय। ये  द्रव्य अस्तिकाय कहलाते हैं।

अणुमहत्त्व―अस्तिकाय का दूसरा नाम अणुमहान् है। अणु का अर्थ यहाँ प्रदेश लिया है। चाहे वह मूर्त पदार्थ हो चाहे अमूर्त पदार्थ हो उनका जो निर्विभाग अंश है वह कहलाता हे अणु। अणु शब्द का अर्थ निर्विभाग अंश है शब्द की दृष्टि में। ये सब पदार्थ लोकाकाश में है। धर्मद्रव्य में असंख्यात अणु है, अधर्मद्रव्य में असंख्यात और आकाश में अनंत, सबमें अणु कह सकते हैं, पर रूढ़ि हो जाने से कुछ अचक ही मालूम होती है। तो अणु का अर्थ है प्रदेश। उन प्रदेशों में जो महान् है अर्थात् प्रचयात्मक है उसे अणुमहान् कहते हैं। अणुमहान् का अर्थ हे अस्तिकाय। जो अणुवों में महान् है ऐसा अथ्र करने पर दो अणु वाला स्कंध नहीं आया। जो प्रदेश से महान् है वह अणुमहान् पर इसका अर्थ यों भी कर सकते कि जो दो अणुवों से महान् है, इसमें दो पुद्गल परमाणुवों का स्कंध है वह अणुमहान् हुआ, अस्तिकाय हुआ। तीसरा अथ्र यों लगाया कि जो अणु हैं, और महान् हैं उन्हें अणु महान् कहते हैं। जो निर्विभाग अंशों से अंशों का परिचयात्मक है उसे अणुमहान् कहते हैं। ऐसा अर्थ करने पर व्यक्ति और शक्ति दो चीजें आ गयी तो जो शुद्ध परमाणु है पुद्गल का वह व्यक्तिरूप से तो अणु है और शक्तिरूप से महान् है, क्योंकि अणु में ऐसी शक्ति है कि वह स्कंध बन सकता है। यों जो जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश में 5 पदार्थ अस्तिकाय हैं, अणुमहान् हैं।

कालद्रव्य की एकप्रदेशिता―इन  अस्तिकायों से छूट गया जो कालद्रव्य है वह अस्तिकाय नहीं है। यद्यपि वह अस्ति है? है, वास्तव में है, लेकिन कालद्रव्य में प्रदेशप्रचय नहीं हैं न तो कालद्रव्य जीवादिक पदार्थों के है, न व्यक्तिरूप प्रदेश प्रचयात्मक है और न परमाणु की तरह शक्तिरूप से प्रदेश प्रचयात्मक है। कालद्रव्य न तो एकप्रदेश से अधिक वाला है और न कभी भी कालद्रव्य मिलकर प्रचयरूप बन जाय ऐसा है। कालद्रव्य के स्वरूप को जानने के लिए रत्नों की राशि का दृष्टांत दिया है। जैसे रत्नों की राशि एक जगह घुल मिलकर पास-पास पड़ी है, पर एक रत्न दूसरे रत्नरूप नहीं हो पा रहा है ऐसे ही कालद्रव्य, लोकालोक के एक-एक प्रदेश पर एक कालद्रव्य है। वे कभी भी मिल जायें पर पुद्गल स्कंध की तरह या जीव के विभाव व्यंजन पर्याय की तरह एकमेक नहीं हो सकते हैं। इस ही कारण कालद्रव्य को अस्तिकाय में ग्रहण नहीं किया है। वह अस्ति तो है पर काय नहीं है। अब इन  अस्तिकायों में अस्ति शब्द का क्या अर्थ है और काय शब्द का क्या अर्थ है, इस विशेष कार्य को बतला रहे हैं।


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