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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 46

From जैनकोष



ववदेसा संठाणा संखा विसया य होंति ते बहुगा ।

ते तेसिमणण्णत्ते अण्णत्ते चावि विज्जंते ।।46।।

अभेद में विवक्षावश भेद का कथन―इस प्रकरण में यह बात कही जा रही थी कि आत्मा और ज्ञान में भेद नहीं है । न तो आत्मा के प्रदेश न्यारे हैं और न ज्ञान के प्रदेश न्यारे हैं । आत्मा ही ज्ञानस्वभाव को रखता हुआ रहा करता है । ऐसी आत्मा की और ज्ञान की अनन्यमयता सिद्ध करने के पश्चात् अब व्यावहारिक प्रयोजन से आत्मा और ज्ञान में किसी दृष्टि से भेद भी हुआ करता है, इसका वर्णन इस गाथा में किया जा रहा है ।

अभिन्न व भिन्न दोनों में भेदकथन की शक्यता―द्रव्य और गुण के जो भेद होते हैं वे अन्य-अन्य प्रकार से किए जा सकते हैं अर्थात् देखे जा सकते हैं । उनमें चार मुख्य प्रकार हैं―व्यपदेश, संस्थान, संख्या और विषय । ये चार क्या चीजें हैं? इनका स्पष्ट विवरण स्वयं इनके विशेष वर्णन के समय हो जायगा । संक्षेप में यों जानो व्यपदेश नाम है नाम का । किसी का नाम कुछ, किसी का नाम कुछ । संस्थान नाम है आकारभेद का और संख्या मायने गणना और विषय मायने भाव, आधार, आश्रय ये चार प्रकार के भेद भिन्न पदार्थों में भी होते हैं और अभिन्न पदार्थों में भी ये भेद देख लिए जाते हैं ।

भिन्न में व्यपदेशादि कथन―जैसे बारूमल की गाय, तो यहाँ दो चीजें भिन्न हैं, बारूमल जुदे हैं, गाय जुदी है, आकार भी भिन्न है ना । ऐसा तो नहीं है कि कभी चार पैर वाले बारूमल दिख जायें और कभी दो हाथ पैर वाली गाय दिख जाय । आकार न्यारा-न्यारा है और गणना भी यह गाय में है, यह बारूमल में है, उसके अंगों में गणना न्यारी-न्यारी है, और आधार भी जुदा है, विषय भी जुदा है । बारूमल की खुराक, बारूमल का रहना अलग है, गाय की खुराक, गाय का रहना अलग है । बारूमल महल में रहते हैं, गाय आँगन में रहती है तो भिन्न-भिन्न चीजों में भी तो ये चार प्रकार के भेद निरखे जाते हैं । और अभेद में भी चार प्रकार के भेद कर लिए जाते हैं।

अभिन्न में व्यपदेशादि कथन―जैसे वृक्ष की शाखा । क्या वृक्ष जुदी चीज है और शाखा जुदी चीज है, फिर भी एक प्रदेश, एक क्षेत्र होने पर भी व्यवहार में तो ऐसा कहा ही जाता है, गलत तो नहीं है कुछ । कोई यदि यह कह दे कि इस वृक्ष में 5 शाखायें हैं तो बताओ इस वृक्ष की 5 शाखायें हैं तो यह गलत बात तो नहीं कही? देख लो, हैं इस वृक्ष में 5 शाखायें, पर वृक्ष कोई अलग चीज हो और उसकी ये शाखायें अलग हों, ऐसा तो नहीं है । तो एक वस्तु में भी एक चीज में ही विवक्षा प्रयोजन आदिक के भेद से भेद कर लिया जाता है । संस्थान भी देख लो, वृक्ष का आकार तो उस समूचे को दृष्टि में रखकर आप जानेंगे । यह वृक्ष का आकार और शाखा का आकार उतने अंश को दृष्टि में रखकर जान जावोगे―शाखा का यह आकार है, तो वृक्ष का आकार जुदा है और शाखा का आकार जुदा है । जितने रूप में वृक्ष का आकार निरखा गया क्या उतने रूप में उस पद्धति में शाखा का आकार दिख जाता है? जिस रूप में जितनी पद्धति में शाखा का आकार दिख जाता है, क्या उस पद्धति में उस रूप में वृक्ष का आकार दिख गया? लो आकार भी भिन्न-भिन्न है और संख्या भी न्यारी है । वृक्ष तो एक है, न शाखायें 5 हैं और विषय भी न्यारा है । वृक्ष का अवगाह वृक्ष में है, शाखा का अवगाह शाखा में है, इतने पर भी वे एक क्षेत्रावगाही हैं, भिन्न क्षेत्र में नहीं हैं । यों अभिन्न में भी ये 4 प्रकार के भेद दिख जाते हैं । इनके अलावा और भी भेद तकिये ।

अभिन्न व भिन्न दोनों में कारकव्यपदेश―बहुत से कारक भेद में भी होते और बहुत से कारक अभेद में भी होते । जैसे बारूमल बाल्टी में गाय के लिए घर से दलिया लाकर आँगन में गाय को थुली खिला रहे हैं । देखो सभी चीजें न्यारी-न्यारी हैं ना, घर जुदा, बारूमल जुदा, बाल्टी जुदा, दलिया जुदा, गाय जुदा, आँगन जुदा, छहों के छहों कारक न्यारे-न्यारे हैं तो भेद में भी यह 6 कारकों का प्रयोग देखा गया है और अभेद में देख लो । यह मिट्टी खुद ही खुद के द्वारा, खुद के लिए, खुद को खुद में घड़े रूप को उत्पन्न करती है । यह बात गलत तो नहीं है? ये अभेद में कारक हैं, एक चीज है वह मिट्टी, और जो कुछ हो रहा है, जिसके द्वारा हो रहा है, जिसके लिए हो रहा है वे सबकी सब बातें अभेद हैं । तो भेद में भी षट्कारक का व्यपदेश है और अभेद में भी षट्कारक का व्यपदेश है । यह आत्मा, आत्मा के द्वारा अपने लिए अपने से अपने में अपने को जानता । है ना यह यथार्थ बात।

भिन्न व अभिन्न दोनों में संस्थानभेद का कथन―भिन्न में भी संस्थान का भेद होता है । जैसे हृष्ट-पुष्ट बारूमल की गाय हृष्ट-पुष्ट है । पुष्ट का संस्थान ही तो हुआ है । दो जगह भिन्न-भिन्न जुदे संस्थान हैं, और अभिन्नता में भी देखा जाता है । पुष्ट वृक्ष की पुष्ट शाखायें हैं । वृक्ष और शाखायें कोई जुदी-जुदी चीजें तो नहीं हैं एक बात है, फिर भी ये दो संस्थान के भेद दिख गये । यह वृक्ष भी पुष्ट है और यह शाखा भी पुष्ट है या कभी गाय तो हो जाय दुबली और बारूमल ज्यों के त्यों रहें तो कहा जा सकता है कि पुष्ट बारूमल की गाय दुर्बल है । देखो जुदे-जुदे संस्थान दो जगह हो गए । कोई वृक्ष ऐसा होता है कि वृक्ष हो जाय पुष्ट और शाखा तने से बड़ी दुर्बल निकल जाय तो वहाँ भी यह कह सकते हैं कि इस पुष्ट वृक्ष की यह दुर्बल शाखा है, पतली शाखा है । तो अभेद में भी संस्थान का भेद किया जाता और भेद में भी संस्थान का भेद किया जाता । यहाँ आत्मा का ज्ञानगुण अभिन्न है, सो अभिन्न में यह भेद किया गया है ।

भिन्न व अभिन्न दोनों में संख्याभेद का कथन―संख्या का भेद देख लो । जैसे यह कहा जायगा कि बारूमल की दो गाये हैं―एक गाय और एक बछिया, तो संख्या दो हो गयी । बारूमल एक ही रहे तो भिन्न में भी संख्या का भेद है, और ऐसा भी तो बोल सकते कि एक वृक्ष की 5 शाखायें हैं तो अभेद में भी गणना हो जाती है, ऐसे ही आत्मद्रव्य के अनंतगुण हैं तो देखो गुणों की संख्याएँ तो बहुत हैं और आत्मा एक ही है, तो अभेद में भी संख्याभेद निरखा जाता है । यह उक्त 4 प्रकार के भेदों का जुदा-जुदा विवरण चल रहा है ।

भिन्न व अभिन्न दोनों में विषयभेद का कथन―अब विषयभेद देखो―आधारभेद देखो । जैसे बहुत दिनों तक गाय की सेवा करते-करते हैरान हो गए तो सलाह करके यह तय किया कि दिनभर यह गाय चर आया करे । बरेदी सबकी गायें ले जाता है तो उनमें यह भी चली जायगी और दिनभर चर आयगी । तो गायों का जो समूह है संस्कृत में उसका नाम है―गोष्ठ और हिंदी में नाम है हेड़ । उस हेड़ का जो उस समय मालिक हो वह हो गया हेड़मास्टर याने बरेदी । अब हेड़ में गाय जाने लगी तो यों कहा कि यह गाय हेड़ में है । तो वह गाय अन्य गायों से भिन्न चीज है । भिन्नता और अभिन्नता का भेद यों जानना कि जहाँ भी प्रदेश भेद हो उसे मानो भिन्न और जहाँ प्रदेशभेद न हो उसे मानो अभिन्न । भेद में व्यवहार ठीक ही है । आँगन में गाय है, कमरे में गाय है । जैसे भेद में भी विषय होता है यों ही वृक्ष में शाखायें हैं यों अभेद में भी आधार आधेय का भेद किया जाता है । ऐसे ही आत्मा में ज्ञानादिक गुण हैं यह अभेद में आधार-आधेय का भेद किया गया है ।

अंतस्तत्त्व के दर्शन की शिक्षा―इस प्रकरण से हमें क्या समझना है कि आत्मा और ज्ञान के बारे में भेद कथन भी किया जा रहा हो कि आत्मा में ज्ञान है, आत्मा का ज्ञान है, ज्ञान का यह स्वरूप है, आत्मा का यह स्वरूप है आदिक भेद किए जाये तब भी निश्चय से यह जानना कि वे भिन्न-भिन्न चीजें नहीं हैं । आत्मा और ज्ञान अभेद एक पदार्थ हैं । प्रकृत में यों निरखना कि नामकर्म के उदय से जो मनुष्य नारकी आदि संज्ञा मिली है आप कौन हैं? मनुष्य हैं, बारूमल कौन हैं? मनुष्य हैं और गाय क्या है? तिर्यंच है, पशु है । यद्यपि ये व्यतिरेक नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए हैं, फिर भी शुद्ध जीवास्तिकाय की दृष्टि से निरखिये । कोई प्रकार का जिसमें संस्थान नहीं है, ऐसा वह सब एक-एक चेतनात्मक पदार्थ है ।

व्यक्त उपादेय तत्त्व―अब जरा व्यक्त रूप से सिद्ध भगवान में निरखिये शुद्ध जीवास्तिकायपना । अंतिम देह से कुछ कम देह के आकार में उनके संस्थान हैं । केवलज्ञानादिक अनंतगुण हैं । इस आत्मा में अनंत गुणों के संस्थान हैं । लोकाकाश प्रमाण असंख्यात शुद्ध प्रदेशी हैं । पंच इंद्रियों का अब वहाँ विषय नहीं रहा । एक शुद्ध आत्मा की भावना से उत्पन्न वीतराग परम आनंद रस से परिणत उनका ध्यान विषय है, तो उस शुद्ध जीवास्तिकाय को भी निरखिये जो व्यक्त रूप से है, वह हम आपके लिए उपादेय है और यह भी स्वभाव में निरखिये जहाँ कि यह भेद गायब हो जाता है, ऐसा शुद्ध अंतस्तत्व हम आपके लिए उपादेय है ।


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