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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 47

From जैनकोष



णाणं धणं च कुव्वदि धणिणं जह णाणिणं च दुविधेहिं ।

भण्णंति तह पुधत्तं एयत्तं चावि तच्चण्णहू ।।47।।

भिन्न व अभिन्न में कर्तृत्व का कथन―इस गाथा में वस्तुधर्म का भेद कहा है, और अभेद किस तरह किया जाता है उसका भी कुछ उदाहरण दिया है । जैसे यह कहा करते है कि धन पुरुष को धनवान बना देता है, यह भेद में व्यवहार है । धन जुदी चीज है, पुरुष जुदी चीज है ऐसा भिन्न-भिन्न पदार्थों में लो व्यवहार बनाया गया है यह भेद व्यवहार का उदाहरण है, और यह कहना कि ज्ञान पुरुष को ज्ञानी बना देता है, यह अभेद उदाहरण में है । ज्ञान जुदी चीज नहीं है, पुरुष जुदी चीज नहीं है, एक ही पदार्थ में विवक्षावश भेद करके बताया गया है । वस्तुतः वहाँ अभेद है । ऐसा ही सर्वत्र जानना ।

व्यहारकथन का निश्चित लक्ष्य―भैया ! व्यवहारकथन को निश्चयदृष्टि का सच न मान लो । किसमें क्या कहा गया है, किसका संकेत किया गया है उसे सच मानो । जैसे माता अपने बच्चे को गोद में लेकर 8 बजे रात को छत पर खड़ी होकर चंदा मामा दिखाती है―देखो बेटा ! वह है चंदा मामा । अंगुली से दिखाती है । कहीं वह अंगुली ही चंदा नहीं बन गयी, पर उस अंगुली के सहारे से उस सीधे मार्ग से निरखे तो चांद दिख जायगा, ऐसे ही किसी वस्तु के संबंध में कुछ भेद कथन से बताने को बात चल रही हो तो उस भेद में ही उलझ नहीं जाना, किंतु उस भेद को एक संकेत ही बनाकर वक्तव्य वस्तु की ओर दृष्टि करना । जैसे कभी आयुर्वेद की कक्षा के विद्यार्थियों को हिमालय पर्वत पर भ्रमण का प्रोग्राम बने, उनके साथ उनका गुरु भी जाय बताने के लिए । वह एक बेंत से बताता जाय देखो यह अमुक रोग की जड़ी है, यह अमुक रोग की दवा है, यों वह गुरु बेंत से उन सभी विद्यार्थियों को सभी दवायें बताता जा रहा है तो क्या कोई विद्यार्थी उस बेंत को ही दवा मान लेगा? शायद हो भी कोई ऐसा भोंदू विद्यार्थी जो उस बेंत को ही रोग की दवा जान जाय, पर वहाँ सभी विद्यार्थी बराबर पहिचान रहे हैं, जिस जड़ी पर बेंत की छाया की, झट विद्यार्थी पहिचान गये कि यह अमुक रोग की औषधि है । तो जैसे उस बेंत के द्वारा औषधि को बताया जा रहा है ऐसे ही शब्दों के द्वारा वस्तु को बताया जा रहा है, पर शब्द ही वस्तु नहीं है । जैसे किसी से कहा जाय कि देखो तुम आत्मा को जानो तो क्या इसका यह अर्थ है कि बड़ा आ, आधा त और बड़ा मा इन शब्दों को जानो? इन शब्दों पर ही दृष्टि न दो, क्या कहा गया था इस बात को समझ लो । जो एक निरंतर जाननहार शाश्वत ज्ञानमय पदार्थ है उसके स्वरूप की जाप और भावना के लिए कहा गया है । शब्द तो एक सहारे हैं । काम तो अंत: करने का है ।

भिन्न व अभिन्न में कर्तृत्वव्यवहार का विवरण―देखो यहाँ भेद में भी व्यवहार है । धन का अस्तित्व जुदा है ना, पुरुष का जुदा है ना । धन में शब्द अलग हैं, पुरुष में शब्द अलग हैं, धन का आकार अलग है, पुरुष का आकार अलग है । धन की संख्या जुदी है, पुरुष की संख्या जुदी है, धन का आधार विषय जुदा है, पुरुष का आधार जुदा है, फिर भी यह कह डालते हैं कि धन पुरुष को धनी बना देता है, यह भिन्न पदार्थों में व्यवहार किया गया है कर्तृत्व का, और ज्ञान की बात देखो तो ज्ञान का अस्तित्व ज्ञानी पुरुष का अस्तित्व वही है । ज्ञान ज्ञानी को ज्ञानी बना देता है । व्यपदेश वही, संस्थान वही, संख्या वही, आधार वही । तो यह अभिन्न में भी कर्तृत्व का व्यवहार चल रहा है । तो व्यवहार से तो यह भेद आत्मा में दिख जाता है, पर निश्चय से यह भेद नहीं है । जो जीव के साथ अभिन्न रूप से रह रहा है, अभिन्न जिसका संस्थान है, संख्या है, अभिन्न ही जिसका आधार है, ऐसा ही यह अंतस्तत्त्व इस जीव को समृद्ध बनाया करता है और जिसे इस अंतस्तत्त्व का लाभ नहीं है, उस ज्ञानस्वरूप की दृष्टि नहीं है तो मनुष्य तिर्यंच नारकादिक गतियों में भ्रमण करता हुआ यह जीव इन कर्मों को भोगकर क्लिष्ट हो रहा है । ऐसे अपने आपके सहजस्वरूप की दृष्टि के बिना यह सारी आपत्तियों का जाल बिछ गया है, और इसकी भावना बन जाय, ऐसा अंतर बल प्रकट हो कि निर्मल केवलज्ञान उत्पन्न हो तब ऐसी शुद्ध स्थिति प्राप्त करने के लिए हम आपका क्या कर्तव्य है कि इस निर्विकल्प स्वसम्वेदन ज्ञान की ही हम भावना करें ।

सत्य के आग्रह व असत्य के असहयोग का प्रयोग―भैया ! जैसे मोह में मोहियों को भिन्न पदार्थों में तृष्णा का भाव जगता है, अपनाने की हठ बनती है ऐसे ही ज्ञानी होकर इस ज्ञानस्वरूप को ही अपनाने का आग्रह करें, सत्य का आग्रह करें और असत्य का असहयोग करें । आत्मा सत्य है, जो शाश्वत चित्स्वभाव है उसका तो आग्रह करो, मुझे अन्य कुछ न चाहिए, और असत्य का, विकारपरिणामों का असहयोग कर दीजिए । हमारा इनको कोई सहयोग न मिलेगा । हमारा सर्वस्व अपने सहजस्वभाव के लिए समर्पित हो चुका है । इस सत्य के आग्रह और असत्य असहयोग के बल से स्वयं ही अपने आप में निर्विकार विशुद्ध आनंद जगेगा और उस आनंद के अनुभव में ही सर्वकल्याण है, ऐसा वह स्वयं अपने आप में समझ जायगा ।


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