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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 50

From जैनकोष



समवत्ती समवाओ अपुधब्भूदो य अजुदसिद्धो य ।

तम्हा दव्वगुणाणं अजुदा सिद्धित्ति णिद्दिट्ठा ।।50।।

गुणी में गुण के तादात्म्य का समर्थन―गत गाथावों में इस प्रकरण में यह बताया गया था कि आत्मा ज्ञान से अनन्य है । आत्मा ज्ञानमय है । इसके विरोध में कुछ दार्शनिकों ने अपनी युक्ति रखी । आत्मा और ज्ञान भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं । उनका संयोग होता है तब आत्मा जानता है । इसमें आपत्ति देने के पश्चात् फिर यह कहा गया कि आत्मा और ज्ञान में संयोग संबंध तो नहीं है, किंतु समवाय संबंध है । जैसे घड़े में रूप का समवाय है, रस का समवाय है, ऐसे ही आत्मा में ज्ञान का समवाय है । समवाय संबंध अपृथक्, अभेद में होता है और वह अयुतसिद्ध में माना जाता है ।

संयोगसंबंध व समवायसंबंध में अंतर―भिन्न-भिन्न पदार्थों में जो संबंध बना, उसका नाम है संयोग संबंध और उसमें संयोग के काल में भी वे पृथक्-पृथक् सिद्ध हैं, किंतु समवाय में जिसका समवाय कहा जाता है वह पृथक्भूत नहीं होता है, वह एक होता है । जब यह बात है तब सीधा ही कह लो ना कि द्रव्य और गुण अभिन्न हैं । अभिन्न तत्त्व को भिन्न बनाकर अभिन्न जैसा बनाने की कसरत क्यों की जा रही है? इससे तो यह सिद्ध हुआ कि द्रव्य गुण का परस्पर में अभेद है, वे एक ही हैं । केवल व्यपदेश आदिक के व्यवहार से भेद का व्यवहार चलता है ।

समवाय का स्वरूप―समवाय नाम है समवर्तित्व का । समवर्तीपने को समवाय कहते हैं । समवर्तीपने का अर्थ है सहवर्ती। जब से आत्मा है तब से ज्ञान है और जब तक आत्मा है तब तक ज्ञान है । जबसे का अर्थ है अनादि से और जब तक का अर्थ है अनंतकाल तक । शाश्वत यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है । द्रव्य और गुण का एक अस्तित्व से रचा जाना, यही सहवृत्ति है । पदार्थ व पदार्थ का स्वभाव ये दोनों सहवर्ती हैं, अनादि अनंत हैं और यही समवाय है । जैन सिद्धांत में इसी को समवाय कह लो और अन्य दार्शनिक भी अंततोगत्वा यही मानकर रहते हैं ।

अनन्यस्वभाव की प्रतीति―वही एक वस्तु व उसका स्वभाव वस्तुत्व से यद्यपि अभिन्न है तो भी संज्ञा प्रयोजनादि के भेद से भेदव्यवहार में आता है, और भेदव्यवहार किये जाने पर भी वास्तव में वह अभिन्न है, एक है । यह कथन बहुत समय से चल रहा है, और कोई भाई सुनते-सुनते ऊब भी गये होंगे, ऐसा यह कथन बहुत लंबा क्यों चलाया जा रहा है और करीब-करीब बारबार वही-वही कथन है । ठीक है, मगर अपने को धनी मानने की अथवा कुटुंबवान मानने की जो भीतर में बार-बार प्रतीति बन रही है जो कि मायारूप है, उससे तो नहीं ऊबते, यह तो परमार्थ निज ज्ञानस्वरूप की प्रतीति की बात है । इसमें क्यों ऊब आये ? वह तो भारी गलती है जो अपने को वैभवशाली, धनी माना जा रहा है । अरे वे तो अत्यंत भिन्न पदार्थ हैं । उनमें क्यों इतनी धुन बनायी जा रही है? उस भूलभरी धुन को काटने के लिए यह ज्ञान की अनन्यता की प्रतीति समर्थ है । मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञानमय हूँ, अन्यरूप नहीं । यही समवाय है, तादात्म्य है ।

गुण व गुणी की अविभक्तप्रदेशता―जैसे इन दो अंगुलियों के परस्पर का जो मिलाप होता है उसका नाम तो संयोग है, और उस ही अंगुली में जो रूप का संबंध है, जो भी इसमें रंग है, जो गंध का संबंध है यह समवाय संबंध है । कहीं अंगुली अलग हो और उसका रंग-अलग पड़ा हो ऐसा देखा है क्या? तो जैसे अंगुली में रूप का समवाय संबंध है इस ही प्रकार इस आत्मा में ज्ञान का समवाय संबंध है । कल्पना में गुणगुणी का भेद कर के फिर उसको अभिन्न बताने का जो उपाय है उस ही का नाम समवाय कथन है । वह समवाय युतसिद्ध में नही बनता । पृथक् सिद्ध हो उसमें समवाय संबंध नहीं बताया जाता । समवाय तो अपृथक् वस्तु को जताने का कारण होता है । द्रव्य और गुण ये सहवर्ती हैं, तदात्मा हैं, ऐसी समवाय वाली बात तो मान लो, पर आत्मा पृथक् है, ज्ञान पृथक् है, इनके समवाय संबंध के कारण यह आत्मा ज्ञान किया करता है, यह अटपट बात यहाँ मानने योग्य नहीं है ।

ज्ञानादि गुणों के तादात्म्य का वर्णन―इस अंतराधिकार में सर्वप्रथम बताया गया था कि 8-9 अधिकारों से जीवतत्त्व का वर्णन किया जायगा, उसमें यह तीसरा अधिकार है । जीव है और यह चेतयिता है इन दो अंतराधिकारों के बताने के बाद यह उपयोग विशेषित है ऐसा यह तीसरा अंतराधिकार चल रहा है । इसमें उपयोग को आत्मा से अभिन्न बताया गया है । इस व्याख्यान में जीव का ज्ञानगुण के साथ अनादि काल से तादात्म्य संबंध कहा गया है और जैसे ज्ञान का आत्मा से तादात्म्य है इस ही प्रकार दर्शन का आनंद का भी तादात्म्य है । जो अव्याबाध रूप स्वयं है, रागादिक दोषों से रहित है, उत्कृष्ट आनंद का एक स्वभाव है ऐसे आनंद आदिक अनंतगुण भी इस आत्मा के साथ तादात्म्यपने को प्राप्त हैं ।

आत्मप्रतीति―भैया ! अपने आत्मा को अपने गुणों से ही अभिन्न रूप से श्रद्धान करना चाहिए, ज्ञान करना चाहिए और समस्त रागादिक विकल्प व्यापार का त्याग करते हुए निरंतर ध्यान करना चाहिए । हम अपने आपके सहजस्वरूप के ध्यान के प्रताप से ही निराकुल रह सकेंगे । इस लोक में बाहर कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है जो हमें निराकुलता का कारण बने । उसका कारण यह है कि सभी परद्रव्य हैं, उनका परिणमन उनमें उनके अनुकूल होता है, उनसे मेरा कोई संबंध नहीं है । जैसा मैं चाहूं तैसा बाह्य में परिणमन हो ऐसा हो नहीं सकता और अनुकूल परिणमन होता नहीं तब यह जीव दुःखी हुआ करता है? किसी भी बाह्यवस्तु से घनिष्टता करने में निराकुलता उत्पन्न नहीं हो सकती है । एक अपने आपके आत्मस्वरूप में बसे हुए इस शुद्ध ज्ञानानंदस्वभाव की उपासना करने में ही हम आपका कल्याण है ।


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