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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 51

From जैनकोष



वण्णरसगंधफासा परमाणुपरूविदा विसेसेहिं ।

दव्वादो य अणण्णा अण्णत्तपगासगा होंति ।।51।।

दंसणणाणाणि तहा जीवणिबद्धाणि णण्णभूदाणि ।

ववदेसदो पुधत्तं कुव्वंति हि णो सभावादो ।।52।।

दृष्टांतपूर्वक गुणगुणी के तादात्म्य व पृथक्त्व का वर्णन―इन दो गाथावों में द्रव्य और गुण का कथंचित् भेद बताया जा रहा है । जैसे कि पहले बताया था, उसके उपसंहार रूप में ये दो गाथाएँ हैं । वर्ण, रस, गंध और स्पर्श ये सब परमाणु पुद्गल की विशेष सहभावी शक्तियाँ हैं और परमाणु द्रव्य और उनसे अभिन्न हैं । लोक में जो यह कहने की पद्धति है कि अमुक में काला, अमुक में नीला, अमुक में लाल रंग है, अमुक भोजन मीठा, अमुक खट्टा है, यह जो भेद-व्यवहार किया जाता है वह प्रयोजनवश किया जा रहा है । वस्तुत: पुद्गल जिस काल में जैसी परिणतिरूप है वैसी परिणतिरूप है । वहाँ विशेष और सद्द्रव्य का भेद नहीं है । ये चार पुद्गल द्रव्य में गुण हैं―वर्ण, रस, गंध, स्पर्श ।

रूपगुण का विवरण―वर्ण नाम है रूप का―काला, पीला, नीला, लाल, सफेद, ये 5 प्रकार के वर्ण होते हैं । वर्ण नाम की जो शक्ति है वह तो पुद्गल में एक शाश्वतरूप है । उस वर्ण शक्ति की जो व्यक्तियाँ हैं, परिणतियाँ हैं वे 5 प्रकार की हैं । ये 5 प्रकार संक्षेप में बताये हैं । वैसे तो इनके भी अनेक भेद हो जाते हैं । कोई कम काला, कोई अधिक काला, कोई कम पीला, कोई अधिक पीला, कोई कम नीला, कोई अधिक नीला यों अनेक भेद हो जाते हैं । इन रंगों के मेल से भी अनेक प्रकार के रंग बन जाते हैं । हरे रंग का नाम इन 5 में नहीं है । नीला और पीला मिलकर हरा बन जाता है । किसी की यह भी कल्पना है कि हवा का रंग नीला है और पृथ्वी का पीला तो बीज में से जो अंकुर निकलता है वह इसी से हरा निकलता है उसमें भी प्रथम तो पीला, फिर हवा लगने से हरा हो जाता है । खैर कुछ भी हो, हरे रंग की शुमार मुख्य रंगों में नहीं है, वह दो रंगों से मिलकर बनता है । इसी तरह सुवापंखी, केसरिया आदि रंग भी तो रंगों के मेल से बना करते हैं । तो वर्ण शक्ति की अनेक पर्यायें हैं ।

रस व गंध गुण का विवरण―ऐसे ही रस की भी अनेक पर्यायें हैं । संक्षेप में तो ये 5 प्रकार हैं―खट्टा, कडुवा, मीठा, तीखा और कषैला । चरपरा कहने से तीखा कहना अधिक ठीक बैठेगा, क्योंकि उसमें चरपरी चीज भी आ गयी और खारी चीज भी खा गयी । इन 5 रसों के भी बहुत भेद हैं, कोई कम मीठा, कोई अधिक मीठा, कोई कम खट्टा, कोई अधिक खट्टा इत्यादि । तो यों रसों के भी अनेक भेद हो जाते हैं । ये व्यक्त जितने रस हैं वे पर्यायें हैं और उन रस परिणमनों का जो मूल आधार है वह है रस शक्ति, रस गुण । इसी प्रकार पुद्गल द्रव्य में एक गंध शक्ति होती है, जिसके प्रकटरूप दो होते हैं―सुगंध और दुर्गंध । इसमें भी अनेक तीव्र मंद के भेद से भेद हैं । कम सुगंध, अधिक सुगंध आदिक ।

स्पर्श गुण का विवरण―स्पर्श नाम की एक शक्ति है । यह स्पर्श स्पर्शनइंद्रिय के द्वारा जाना जाता है इसलिए इसे स्पर्श शक्ति कहते हैं, पर मूल में पदार्थों में दो प्रकार की शक्ति स्पर्श संबंधी पड़ी है । एक शक्ति का तो ठंड गर्मी इन दो में से किसी एक रूप परिणमन होता है । पुद्गल द्रव्य में वस्तुत: चार स्पर्श होते हैं । किंतु पुद्गल में जब स्कंध बनता है तो इन स्कंधों में चार व्यवहार और चलने लगते हैं―हल्का, भारी, नरम और कठोर । ये चार पुद्गलद्रव्य में मूल शक्ति से उठे हुए गुण नहीं हैं, किंतु पुद्गल का जब पिंड बनता है तब इसमें ये चार बातें और प्रकट होने लगती हैं ।

गुणगुणी की अपृथक्ता―जिस प्रकार ये वर्ण आदिक परिणमन परिणमनकाल में पुद्गल में तन्मय हैं, और इनकी मूल आधारभूत जो चार प्रकार की शक्तियाँ हैं वे पुद्गल में शाश्वत तन्मय हैं, द्रव्य में तन्मय हैं । ये द्रव्य की इस तन्मयता का प्रकाश करने वाले हैं । इसी प्रकार से जीव में दर्शन ज्ञानादिक गुण भी जीव में शाश्वत अभिन्न हैं । केवल नाम आदिक प्रयोजन से भेद किया जाता है, पर स्वभाव से भेद नहीं है । जैसे परमाणु का और वर्णादिक का प्रदेश अविभक्त है, ऐसे ही आत्मा और ज्ञान अविभक्तप्रदेशी हैं । ऐसा नहीं है कि परमाणु अन्य प्रदेशों में रह रहा हो और ये वर्ण आदिक अन्य प्रदेश में रह रहे हों । ये गुण तो प्रदेश में कीलित हैं, अनादि सिद्ध हैं, इनका यह स्वरूप ही है, अग्नि से गर्मी निकालकर लावो यदि कहीं मिल जाय तो । यदि आप बुझाकर कोयला ले आयें तो आप अग्नि कहां लाये, कोयला ले आये । तो जैसे परमाणु में वर्ण रस आदिक गुण अभिन्न हैं, केवल एक विवक्षा और व्यपदेश से उनमें भिन्नता का प्रकाश होता है, इसी प्रकार ज्ञान दर्शन भी आत्मा में अविभक्त हैं? जो प्रदेश आत्मा का है वही प्रदेश ज्ञान का है । फिर तो संज्ञा आदिक विशेषों से उनमें पृथक्त्व वर्णित किया जाता है । स्वभाव से वह हमेशा अपृथक् स्वभाव वाला है ।

ज्ञानगुण की प्रधानता―वस्तुत: आत्मा ज्ञानस्वरूप है । ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है । इस आत्मा का जितना व्यवहार चलता है, जो पुरुषार्थ और कर्तव्य चलता है वह ज्ञान के माध्यम से ही चलता है । इसी कारण यह आत्मा करता क्या है, ऐसा प्रश्न होने पर सीधा यही उत्तर मिलता है कि यह जानता है । ज्ञानगुण आत्मा का एक असाधारण गुण है । चैतन्य के नाते यद्यपि आत्मा में दर्शनगुण भी है और चैतन्य की अविनाभाविता में आत्मा में आनंदगुण भी है, फिर भी सब गुणों की व्यवस्था बताने वाला, अन्य गुण का सद्भाव बताने वाला, अपने हित और अहितरूप विवरण करने वाला ज्ञानगुण ही है, इस कारण सर्वगुणों में प्रधान आत्मा का यह ज्ञानगुण है, इस ज्ञानगुण से इस ज्ञानस्वरूप की जानकारी रखी जाय तो चूंकि ज्ञाता भी ज्ञान बना और ज्ञेय भी ज्ञान बना तो वह कर्ता कर्म में अभिन्न बन जाता है, एकरस हो जाता है । फिर वहाँ विकल्पों का अवकाश नहीं रहता और ऐसे विकल्पों के अनवकाश के समय इस आत्मा को ज्ञानानुभूति प्रकट होती है ।

धर्मपालन के लिये कर्तव्य―धर्म के लिए क्या करना है? यह ज्ञानी जानता तो निरंतर है, कभी किसी को जाने, कभी किसी को जाने। तो तुम यह निर्णय कर लो कि हम जाने बिना तो कभी रहते नहीं, जाने बिना कोई काम नहीं होता, रोजिगार नहीं होता । सारे दिन रात बेकार रहें, ढलुवा जैसे पड़े रहें, घर के किसी कोने में एक जगह बैठे रहें । कोई पूछे क्यों भाई कैसे बैठे हो? अरे बेकार बैठे हैं, काम ही नहीं है, मगर भीतर में देखो यह काम बराबर प्रतिसमय करता ही जा रहा है । जाने बिना तो जीव रह ही नहीं सकता । कुछ न कुछ जरूर जानेगा । अब यह निर्णय कर लो कि हम कैसी चीज जाना करें, किस चीज के जानने में अधिक देर रहा करें जिससे हमारा कल्याण हो, पवित्रता हो, कर्मबंधन से मुक्ति हो, संसार के संकटों से छूट जायें? ऐसा कौन-सा पदार्थ है जिस पदार्थ के जानने से हमारे समस्त क्लेश दूर हो जायें? यह निर्णय कर लो । निर्णय करने में विलंब न लगेगा, क्योंकि जिसके ज्ञान से हित नहीं है, जिन पदार्थों में राग करने से हित नहीं है, उन पदार्थों से राग कर-करके तबीयत बहुत कुछ ठिकाने आ गयी है और उससे ऊब भी बहुत-बहुत बार आ चुकी है, इस कारण अहित की चीज से हटने की बात समझने में विलंब न लगना चाहिए । तो ये बाह्यपदार्थ ज्ञान के आलंबन के योग्य नहीं हैं । एक अपना अनादि सिद्ध शुद्ध चैतन्यस्वभाव ही अपने ज्ञान के द्वारा आलंबन करने योग्य है । ज्ञान, ज्ञान को जानता रहे, यही धर्मपालन है ।

निश्चयधर्म की पात्रता के लिये व्यवहारधर्म की उपयोगिता―भैया ! जितने भी धर्म के नाम पर व्यवहार किये जाते हैं वे सब व्यवहारधर्म हैं । व्यवहारधर्म का लक्ष्य यही है कि हमारी ऐसी स्थिति बन जाय कि यह ज्ञान इस ज्ञानस्वरूप को ही जानता रहे, अन्य पदार्थों के जानने का श्रम और विकल्प न करे । उस ही में निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है, उससे ही वीतराग सहज आनंद जगता है और सहज परमशुद्ध आनंद जगता है । यही इस जीव का सर्वोत्कृष्ट वैभव है । इस कारण हमें प्रयत्न करके अपने आपके स्वरूप की जानकारी का ही उद्यम करना चाहिए।

।। पंचास्तिकाय प्रवचन द्वितीय भाग समाप्त ।।


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