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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-25

From जैनकोष



अणव: स्कंधाश्च ।। 5-25 ।।

अणु और स्कंध पुद्गलों का निर्देशन―स्पर्श आदिक परिणाम वाले पुद्गल दो प्रकार के हैं―(1) अणु और, (2) स्कंध । अणु तो सबसे छोटा अविभागी द्रव्य है और स्कंध दो या दो से ज्यादह अणुओं के बंध से हुआ पिंड है । अणु शब्द अणु धातु से बना है । जिसकी निरुक्ति है―अण्यंते शब्द्यंते इति अणु । प्रदेशमात्र में रहने वाले स्पर्श आदिक गुणों के द्वारा जो निरंतर परिणमते रहते हैं, इस प्रकार जो कहे जाते हैं यों शब्द के जो विषय बनते हैं वे अणु कहलाते हैं । यह अणु अविभागी एकप्रदेश मात्र परमाणु है, इसी कारण प्रत्येक परमाणु प्रदेशमात्र है यही उनकी आदि है, यही मध्य है और यही अंत है । यदि अणु का आदि मध्य अंत कुछ और-और बने तो वह अविभागी नहीं रह सकता । ये अणु इंद्रिय के द्वारा ग्रहण में आ ही नहीं सकते । स्कंध शब्द बना है स्कंधिद् धातु से । जिसका अर्थ निकलता है कि स्थूलपने से ग्रहण में रखने आदिक व्यापार में जो आ सकें उनको स्कंध कहते हैं । यद्यपि स्कंध का अर्थ यह निकलता है तो भी रूढ़ि अर्थ समझना याने कई स्कंध ऐसे होते हैं जो ग्रहण करने या रखने आदिक व्यापार के अयोग्य हैं, फिर भी वे स्कंध कहलाते हैं । जो दो परमाणुओं का पिंड है, तीन-चार आदिक संख्यात परमाणुओं का पिंड है,यहाँ तक कि असंख्यात परमाणुओं का जो पिंड है वह ग्रहण और रखने आदिक में नहीं आता । जितने भी ये स्कंध हम आपके व्यवहार में आ रहे हैं वे सब अनंत परमाणुओं के पिंड हैं ।

सूत्र में अणु और स्कंध इन दो शब्दों को जुदे-जुदे पद में व बहुवचन में रखने का कारण―सूत्र में अणु और स्कंध दोनों शब्दों में बहुवचन का प्रयोग किया गया है । सो यद्यपि समग्र पुद्गल अणु और स्कंध में आ गये फिर भी अणु अनेक हैं, अनंत हैं, स्कंध भी अनेक हैं । तो उन जाति के आधार में अनंत भेद वाले ये पुद्गल हैं, ऐसी सूचना के लिये इन दोनों शब्दों का बहुवचन में प्रयोग किया गया है । यहाँ कोई शंका करता है कि दो पद अलग-अलग न रखते सूत्र में और सीधा ही कह देते अणु स्कंध ऐसा समास कर देते, बहुवचन भी रखा रहता तो यह लघु वचन बन जाता और जितना कम से कम वचन कहे जायें सूत्र में उतना ही उत्तम सूत्र माना जाता है । इस शंका के समाधान में कहते हैं कि यहाँ अणु और स्कंध को जुदा-जुदा रखने का प्रयोजन यह है कि यह ज्ञात होवे कि स्पर्श, रस, गंध, वर्ण वाले तो परमाणु हैं और शब्द बंध । सौक्ष्म्य आदिक जो पूर्व सूत्र में द्रव्य पर्यायें कही गई हैं वे सब स्कंध है । यद्यपि स्कंध की परिस्थिति में भी स्पर्श, रस आदिक रहते हैं मगर स्पर्श रस आदिक सभी अणुओं में हैं और अणु मिलकर एक पिंड बने तो वहाँ भी स्पर्श आदिक रहे । किंतु अणु में न था और स्कंध बने तब ही स्पर्श आदिक हो, ऐसी बात नहीं है । इस कारण स्पर्शादिक तो अणु के ही कहलाते हैं । शब्द बंधादिक ये अणु के नहीं कहला सकते, क्योंकि अणुओं में ये पर्यायें हैं ही नहीं । वहाँ तो केवल स्वभाव द्रव्य व्यंजन पर्याय है―आकार के नाते, प्रदेश के नाते । और, शब्द बंधादिक जो पर्यायें हुई हैं वे स्कंध होने पर ही हुई हैं । इससे ही सूत्र में कहे गये दोनों शब्दों का पूर्व सूत्र जो दो कहे गये है उनके साथ क्रम से संबंध बनता है, यह सूचना देने के लिये अणु और स्कंध दोनों शब्दों का समास न करके जुदे-जुदे पद में रखा है ।

परमाणु कारण कार्योभयरूपता―अब यहाँ एक शंकाकार कहता है कि परमाणु तो कारण रूप ही होता है और वही वास्तविक अंत्य परमाणु कहलाता है । यह शंका करना भी बिना विचारे बोलना है, क्योंकि परमाणु कथंचित् कार्य रूप भी हैं । जैसे आगे सूत्र आयेगा―भेदादणु:, भेद से अणु परमाणु बनता है । तो वह अणु कार्य रूप ही तो कहलाया । तो वह अणु केवल कारण रूप ही है, यह कहना सही तो न रहा । यदि शंकाकार यह कहे कि हम को कथंचित् कार्यरूप परमाणु को मानने में विरोध नहीं है, पर परमाणु के कारणपने का निषेध तो नहीं हुआ, इसके उत्तर में कहते हैं कि बात तो यह ठीक है, परमाणु कार्य रूप भी है, कारण रूप भी है, किंतु यहाँ शंकाकार तो एकवाद शब्द लगाकर बोलता है कि परमाणु कारण रूप ही है । तो ऐसा कहने से परमाणु के कार्यरूपपने का निषेध तो बन जाता है सो तो सही नहीं है, परमाणु कारणरूप भी है और कार्यरूप भी है । और, शंकाकार ने साथ ही यह कहा अपने सिद्धांत में कि कारण परमाणु नित्य ही होता है या परमाणु नित्य ही होता है,सो भी अयुक्त है, क्योंकि परमाणु स्निग्ध, रुक्ष आदिक रूप परिणमन होने से अनित्यरूप भी है न कोई परमाणु स्निग्ध में ही अनेक डिग्रियों में परिणमन करता रहता है अथवा कभी स्निग्ध से रुक्ष रूप परिणमता है तो एक अवस्था का प्रादुर्भाव हो, एक अवस्था का व्यय हो तो जहाँ उत्पाद व्यय हो वहीं तो अनित्यपना कहलाता है । अब शंकाकार कहता है कि कारण परमाणु यदि अनादि से ही अणुत्व अवस्था में रहता है और वह दो अणु आदिक पिंड रूप कार्य का कारण भी बनता है तो भी वह कारणरूप ही तो रहा, कार्य न रहा, क्योंकि वह भेद से उत्पन्न नहीं हुआ । वह तो अपनी स्वरूप सत्ता को लिये हुये है ही । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि परमाणु को यदि अनादि से अणुत्व अवस्था वाला ही माना जाये अर्थात वह अणु से कभी स्कंध रूप में नहीं आता तो ऐसे अणु में कार्यपना हो ही नहीं सकता । अर्थात जो शंकाकार की यह मान्यता है कि द्वयणुक आदिक स्कंधों का हेतुभूत होने पर भी वह सदा कारणरूप ही रहता है तो दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं । यदि अनादि पारिणामिक अणुरूप ही अवस्था मानी जाये तो उसका कार्य नहीं हो सकता । कार्य हुआ तो वह अणुत्व स्वभाव न रहेगा । सो कार्यरूप तो स्वीकार करते ही हैं, क्योंकि कार्यरूप न माने तो कारण शब्द भी नहीं कहा जा सकता । तो जब कार्य मान लिया गया तो एक बार वह स्कंध में आ गया, पिंड रूप बन गया । अब जब कभी भी उनका भेद होगा तो उससे अणु की निष्पत्ति होगी इस कारण वह कार्यरूप सिद्ध हो ही जाता है ।

छाया आदिकों की स्कंध कार्यता―यदि शंकाकार यह कहे कि छाया आदिक भी परमाणु के कार्य हैं जो कि अनादि से अणु रूप रह रहा है सो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि छाया जैसा कार्य स्कंधों के कारण होता है । ये छाया आदिक अनादि परमाणु के कार्य नहीं हैं, किंतु अनेक परमाणुओं का मिलकर जो शरीरादिक पिंड बना है वह पिंड का कार्य है छाया । यहाँ यह संदेह न कहना कि यह केवल कहने मात्र की चीज है, छाया आदिक स्कंध के कार्य हैं, परमाणु के कार्य नहीं हैं, यह संदेह यों न रखना कि छाया आदिक तो चाक्षुष हो रहे हैं, चक्षुइंद्रिय के विषयभूत हैं । सबको दृष्टि में आ रहा है कि यह अमुक चीज की छाया पड़ रही है । तो जो भी चाक्षुष है, छाया आदिक वे अचाक्षुष अणु के कार्य नहीं हो सकते । परमाणु तो स्वयं अचाक्षुष है । जब चक्षु इंद्रिय के द्वारा ग्रहण में आ ही नहीं सकता तो उसका कार्य कैसे चाक्षुष बन जायेगा? और जो शरीर आदिक की छाया पड़ रही है वह शरीरादिक चाक्षुक है तो उनका कार्य छाया आदिक भी चाक्षुष है ।

परमाणु की विशेषतायें―यहाँ यह निष्कर्ष निकला कि वह परमाणु द्रव्य दृष्टि से नित्य है, पर्यायदृष्टि से अनित्य है और इसी प्रकार परमाणु कारणरूप है―और कार्य रूप भी है । परमार्थ में कोई एक रस रहेगा । पाँचों रस पर्यायें नहीं रह सकती । दो गंध पर्यायों में एक गंध पर्याय होगा, इसी प्रकार 5 वर्ण पर्यायों में से कोई एक वर्ण पर्याय होगी । स्पर्श में दो स्पर्श पर्याय हो सकते हैं । स्निग्ध सूक्ष्म में से एक शीत और उष्ण में से एक । इस तरह परमाणु 5 गुण पर्याय वाला हुआ । स्कंध तो अनेक परमाणुओं का पिंड है, सो उसमें यह देखा जाता है कि उसका कोई हिस्सा चिकना है तो कोई हिस्सा रूखा है । कोई ठंडा है तो कोई गरम है । जैसे एक धूपदान है वह गरम है और उसमें जो डंडी है, उठाने की वह डंडी है या कोई एक ही काठ है वह एक ओर गरम है, एक ओर ठंडा है । स्कंधों में तो यह बात देखी जा सकती; पर परमाणु में यह बात नहीं हो सकती, क्योंकि वह अविभागी पुद्गल द्रव्य है । उसमें तो रस पर्याय कोई एक, गंध पर्याय कोई एक, वर्ण पर्याय कोई एक और दो स्पर्श पर्यायें होती हैं । दो स्पर्श पर्यायें परमाणु में मानने पर कोई विरोध नहीं है । परमाणुओं में गुरुलघु, कोमल, कठोर ये स्पर्श संभव ही नही हैं । ये चार स्पर्श पर्यायें स्कंध में ही होती हैं । परमाणु है या नहीं, उनका अस्तित्त्व उनके कार्य से जाना जाता है । यदि परमाणु न होते तो शरीर इंद्रिय और जो-जो भी कुछ दृश्य पदार्थ हो रहे हैं ये कार्य न बन सकते थे । अथवा जो भी दिख रहा है, इसके भाग बनाये जाये, दो भाग हुये, चार भाग हुये, बनाते जायें, जो अंतिम भाग है उस भाग के भी सहज अनेक भाग होवेंगे । उन सबमें जो अविभागी पुद्गल है उसी को ही अणु कहते हैं।

अणु की अनेकांतरूपता―अणु के संबंध में जो-जो भी दार्शनिक के सिद्धांत हैं वे किन-किन दृष्टियों को लेकर हैं इस कारण यदि उसका पूर्णरूप से निर्णय बनाया जाये तो वह अनेकांत का ही निर्णय बन सकता है और उस दृष्टि से परमाणु कथंचित् कारणरूप है, कथंचित् कार्यरूप है । क्योंकि दो अणु वाला अनेक अणु वाला स्कंध बनने का निमित्त है परमाणु । मूल तो परमाणु ही है इस कारण वह कारणरूप है । पर अब स्कंध अवस्था में आ गया, तब कभी भेद होगा तो भेद होते-होते अंतिम भेद से जो निष्पन्न होगा वह परमाणु है और इसी कारण वह कार्यरूप है । परमाणु का और भेद नहीं हो सकता और इसका कारण कार्यरूप है । परमाणु का और भेद नही हो सकता इस कारण परमाणु कथंचित् अंत्य है अर्थात् अंतिम भाग है जिसके कि और विभाग नहीं हो सकते, फिर भी याने प्रदेशमात्र होने पर भी गुणों का भेद उनमें पाया जाता है । एक प्रदेशी परमाणु में भी स्पर्श, रस गंध, वर्णादिक गुणों पर दृष्टि देते हैं तो उन दृष्टियों से इसके भेद बनने से यह अंत्य नहीं रहता है । ये परमाणु अपने इस द्रव्य स्वरूप का त्याग नहीं कर सकते इस कारण ये नित्य हैं । तो बंध और भेद पर्याय की दृष्टि से या उनके गुण अन्य-अन्य पर्यायों रूप से परिणमते रहने से ये परमाणु अनित्य कहलाते हैं । ये परमाणु कार्य के द्वारा पहिचान में आते हैं । इन पिंडों को देखकर परमाणु का अनुमान ज्ञान बनता है इस कारण परमाणु कार्यलिंग है, अर्थात कार्य जिसका अस्तित्त्व बताने वाला चिन्ह हो उसे कार्यलिंग कहते है । फिर भी प्रत्यक्ष ज्ञान में आ सके, ऐसी पर्याय की दृष्टि से वह कार्यलिंग नहीं है । यहाँ तक परमाणु का कथन हुआ ।

अब कुछ स्कंध के बारे में कहते हैं । स्कंध कहलाता क्या है? जिसका बंध परिणाम प्राप्त हुआ है अर्थात अनेक परमाणुओं का मिलकर बंध होकर जो पिंड बना है उसको स्कंध कहते हैं । वह स्कंध है क्या? बंध को प्राप्त परमाणुओं का ही समूह है । ऐसे ये स्कंध तीन प्रकार के हैं―स्कंध, स्कंध देश और स्कंध प्रदेश । अनंतानंत परमाणुओं का जहां बंध विशेष हुआ है वह पूरा पिंड स्कंध कहलाता है । उसका आधा भाग देश कहलाता है और उस आधे का भी आधा भाग प्रदेश कहलाता है । वह स्कंध ये ही सब पर्यायें तो हैं, जो दृष्टिगोचर हैं, हमारे उपयोग और व्यवहार में आ रहे हैं । पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु । अन्य दार्शनिकों की दृष्टि के अनुसार वनस्पति भी चूंकि पिंड रूप है, सो उसे ही अन्य जनों ने पृथ्वी में ही गर्भित किया है । पृथ्वी घट आदिक है, जो स्पर्श आदिक गुण वाले हैं, और शब्द बंध आदिक द्रव्य पर्याय वाले हैं । जल आदि भी विकार रूप होने से यह भी स्पर्शादिक गुण वाला है और शब्दादिक पर्यायों वाला है ।

प्रत्येक भौतिक पदार्थों की स्पर्श रस, गंध वर्ण युक्तता―कुछ दार्शनिकों की ऐसी दृष्टि है कि पृथ्वी में तो स्पर्श, रस, गंध, वर्ण चारों पाये जाते हैं, पर, जल में गंध नहीं पाया जाता । अग्नि में रस और गंध दोनों नहीं पाये जाते, वायु में रस, गंध, वर्ण तीनों नहीं पाये जाते, पर उनका कथन भी मोटा कथन है । वास्तव में तो जहाँ स्पर्श, रस, गंध, वर्ण में से कोई एक भी गुण हो तो वहाँ चारों गुण होते ही हैं । भले ही किसी में किसी गुण की पर्याय प्रकट न मालूम होती हो तो भी ये । गुण सदा चारों ही साथ रहते हैं । वस्तुत: तो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु भी जुदे-जुदे पदार्थ नहीं हैं । पर्यायें सब जुदी-जुदी चल रही हैं । किंतु वे सब एक पर्याय जाति के ही रूप हैं तब ही तो सूर्यकांतमणि जो पृथ्वी है वह सूर्य की किरणों का सान्निध्य पाकर जल बनता, चंद्रकांतमणि चंद्र की किरणों का संयोग पाकर जल होता। तो पृथ्वी भी जल रूप बन गई। तो ऐसे ही ये चारों पर्यायें भी एक स्कंध में, कालांतर में बदलती रहती हैं और इसी कारण जब सबका मूल परमाणु है तो सभी में स्पर्श, रस, गंध याने ये चारों ही गुण पाये जाते हैं ऐसे अनेक परिणमन अनुभव में भी आ रहे हैं। कोई आहार ग्रहण किया, जल पिया, उसके फल में भी वात, पित्त, श्लेष्मा ये परिणमन होते है। जठराग्नि भी है, तेज भी है। उस खाये हुए अन्न में वायु भी बन गई तो ये सब एक दूसरे रूप परिणमते रहते हैं। तो यों पृथ्वी हो वह भी चारों गुणवान है। इसी तरह जल, अग्नि, वायु भी चारों गुणों से युक्त है। इस कारण जिसका यह दर्शन है, सिद्धांत है कि पृथ्वी आदिक 4, 3, 2, 1 गुण वाले हैं, वह सिद्धांत युक्त नहीं है।

अणु और स्कंधों की निष्पत्ति की विधि की जिज्ञासा―अब यहाँ तक अणु और स्कंध का लक्षण कहा गया तो वहां यह जिज्ञासा होना प्राकृतिक है कि अणुरूप और स्कंधरूप परिणाम क्या अनादि से ही ऐसा है या वह किसी समय बनता है, अनादिमान है? तो उत्तर तो इसका यही है कि वह अनादिमान है । उनका यह परिणमन, आकार, पर्याय समय-समय पर बनता है । तो जब यह आदिमान है तो यह भी जिज्ञासा होना प्राकृतिक है कि आखिर वह किस निमित्त से उत्पन्न होता है । तो इस जिज्ञासा के समाधान के लिए अणु और स्कंधों की निष्पन्नता का कारण बतायेंगे जिसमें सर्वप्रथम संघात की उत्पत्ति का करण बताने के लिये सूत्र कहते हैं ।


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