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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-26

From जैनकोष



भेदसंघातेभ्य उत्पद्यंते ।। 5-26 ।।

स्कंध की निष्पत्ति का विधान―भेद, संघात और भेद संघात से स्कंध उत्पन्न होता है । भेद किसे कहते हैं? मिले हुए स्कंध का बाह्य आभ्यंतर कारण के वश से नानापन हो जाना इसे भेद कहते हैं, और संघात किसे कहते हैं? अलग-अलग रहने वाले पदार्थों का एकीभाव हो जाना इसे संघात कहते हैं । यहाँ एक शंका हो सकती है कि जब शब्द दो ही दिये हैं―भेद और संघात, और दोनों का समास किया है तो द्विवचन इस पद में आना चाहिये । बहुवचन क्यों दिया है? समाधान यह है कि दो शब्द हैं और उनका समास है और फिर भी बहुवचन है तो उसमें कोई अर्थ विशेष जाना जाता है । अथवा ये 3 शब्द रखना चाहिये । (1) भेद (2) भेदसंघात और (3) संघात । तीनों का समास होने पर दो बार प्रयुक्त किये गये भेद शब्द में एक लुप्त हो जाता है । जिससे तीन जाहिर होता है । कोई संघात बड़ा है और उसका भेद बना और भेद होने पर भी संघात ही रहा, स्कंध ही रहा । तो वह स्कंध भेद से उत्पन्न हुआ है, जैसे मानों 8 अणुओं का स्कंध है और भेद हो जाने पर, 4-4 अणु के दो स्कंध हो गये तो स्कंध ही तो रहे, तो ऐसे ये स्कंध भेद से उत्पन्न हुए हैं । कभी स्कंधों का भेद हुआ और उसी समय उसमें कुछ स्कंध या अणु मिले गये तो वह भेद संघात रहा, भेद भी रहा और संघात भी रहा याने भेद के साथ संघात रहा । यों यह स्कंध भेदसंघात से उत्पन्न हुआ और केवल संघात से उत्पन्न हुआ, यह तो केवल स्पष्ट ही बात है । अनेक परमाणु मिल गए, स्कंध बन गया । यहाँ उत्पद्यंते क्रिया है, जिसमें उप तो उपसर्ग है और पदगतौ धातु है । उत उपसर्ग के साथ पद धातु का अर्थ बनता है उत्पन्न होना । स्कंध भेद संघातों से उत्पन्न होता है । यहां भेद संघातेभ्य: यह हेतु के अर्थ में पद प्रयुक्त है । भेद संघातों के कारण यह स्कंध उत्पन्न होता है । विभक्ति तो यह पंचमी है और पंचमी विभक्ति भी हेतु अर्थ में आती है, लेकिन प्रकरण अनुसार सभी विभक्तियों के हेतु अर्थ निकल जाते हैं । स्कंध दो अणु का भी होता है । एक-एक बढ़ाते जाइये―संख्यात, असंख्यात अणुओं का होता है और अनंत अणु का भी स्कंध होता है । तो दिखने में जितने भी स्कंध आते हैं वे सब अनंताणुस्कंध हैं । अब स्कंधों की उत्पत्ति के कारण बताकर अणु की उत्पत्ति का कारण बतलाते हैं ।


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