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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-13

From जैनकोष



केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ।।6-13।।

(65) प्रभु श्रुत मुनि धर्म व सुर के अवर्णवाद में दर्शनमोह के आस्रव की हेतुता―केवली भगवान का अवर्णवाद, श्रुत याने शास्त्र आगम का अवर्णवाद, संघ अर्थात् मुनिजनों का अवर्णवाद, धर्म का अवर्णवाद, देव का अवर्णवाद, ये दर्शनमोहनीय के आस्रव के कारण होते हैं। अवर्णवाद का अर्थ है कि जैसा स्वरूप है वैसा न वाद अर्थात् न कहना उल्टा कहना सो यह है अवर्णवाद । केवली भगवान किसका नाम है? जो इंद्रिय के क्रम और व्यवधान का उल्लंघन कर ज्ञान से सहित है वह केवली प्रभु हैं याने चक्षु आदिक हुए करण और कुछ काल जाने, कुछ काल न जाने या बाहरी भींत आदिक से आवरण हटना यह कहलाता है व्यवधान तो इंद्रिय से जानने का क्रम भी नहीं है जहां और किसी चीज की आड़ भी नहीं है जहां, ऐसा जो स्वाभाविक ज्ञान है जो ज्ञानावरण के पूर्ण नष्ट होने पर प्रकट होता है । ऐसा जो स्वाभाविक ज्ञान है वह जिनके पाया जाये उन्हें कहते हैं अरहंत भगवान । श्रुत किसे कहते हैं? उन अरहंत भगवंतों के द्वारा उपदेश किए गए जो वचन हैं वे श्रुत कहलाते हैं । राग द्वेष मोह से जो दूर हो गए उनके द्वारा कहे हुए वचन ही आगम हैं । जो रागद्वेष मोह से दूर नहीं हैं उनके वचन कैसे पूर्ण सत्य हो सकते? मूलभूत कैसे हो सकते कि जिसके आधार पर सर्व जिनागम के वचनों का स्पष्ट भाव लाया जा सकता । तो रागद्वेष मोह से रहित प्रभु के द्वारा उपदिष्ट आगम श्रुत कहलाता है और उस श्रुत को धारण किसने किया? उसे धारण किया है गणधरों ने । उसका अर्थ मन में ठीक समझा है तो बुद्धि ऋद्धि रखने वाले गणधर देवों का वह श्रुत कहलाता है । संघ क्या कहलाता है? सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र से युक्त चारों प्रकार के मुनियों का जो समुदाय है वह संघ संघ कहलाता है। यहां एक जिज्ञासा हो सकती है कि तब फिर एक ही मुनि हो तो, उसका नाम छूट गया, संघ में वह तो न आ पाया, सो ऐसी शंका यों न करना कि एक भी मुनि हो वह भी संघ कहलाता है, क्योंकि अनेक व्रत गुणों का संघ यहाँ पाया जाता है । धर्म क्या कहलाता है? अहिंसाभाव जो जिनागम में कहा हैं वह धर्म कहलाता है और देव कहलाते हैं देवगति के जीव इन सबका अवर्णवाद करना अर्थात् निंदा करना ये दर्शन मोहनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं जिससे कि आगे सम्यक्त्व में बाधा आती रहेगी ।

(66) अज्ञानियों द्वारा केवली आदि के विषय में किये जाने वाले अवर्णवादों का चित्रण―अवर्णवाद का भाव है । जो गुणवान पुरुष हैं, महान संत है उनमें अपनी बुद्धि की मलिनता के कारण न भी कोई दोष हों उनमें तो भी उन दोषों का कहना इसे अवर्णवाद कहते हैं । तो केवली आदिक के विषय में अवर्णवाद करना दर्शनमोहनीय के आस्रव का कारण है । केवली भगवान का अवर्णवाद अज्ञानीजन किस प्रकार करते हैं? ये केवली भोजन करके जिंदा रहते हैं, हम लोगों जैसा पिंड का आहार करके ही जीवित रहा करते हैं, कंबल आदिक धारण करते हैं, तूमड़ी का पात्र रखते हैं, केवली प्रभु के भी ज्ञान और दर्शन क्रम से होते हैं, आदिक अवर्ण अस्वरूप बोलना यह केवली का अवर्णवाद है । आगम का अवर्णवाद क्या है? यह बताना कि शास्त्रों में, आगम में भी मद्य मांस का भक्षण लिखा है, शराब का पीना बताया है । कोई पुरुष काम से पीड़ित हो तो उसे प्रेमदान देना बताया है । रात्रि भोजन आदिक में कुछ दोष नहीं है, इस प्रकार शास्त्र का नाम लेकर कहना यह श्रुत का अवर्णवाद है । संघ का अवर्णवाद―ये मुनि श्रमण अपवित्र हैं, शूद्र हैं, स्नान न करने से ये मलिन शरीर वाले हैं, दिगंबर हैं, निर्लज्ज हैं, ये इस लोक में ही दुःखी हैं, परलोक भी इनका नष्ट है आदि रूप से मुनि जनों की निंदा करना, उन्हें अस्वरूप कहना यह संघ का अवर्णवाद है । धर्म का अवर्णवाद―जिनेंद्रभगवान ने जो धर्म बताया है वह निर्गुण है, उसमें कुछ महत्त्व नहीं है, इस धर्म के धारण करने वाले मरकर असुर होते हैं आदिक रूप से धर्म का अवर्णवाद करना यह दर्शनमोहनीय के आस्रव का कारण है । देवों का अवर्णवाद―देवगति के जीवों के लिए बताना कि ये मद्य मांस का सेवन करते हैं, ये अहिल्या आदिक में आसक्त हुए थे आदिक रूप से देवों का खोटा स्वरूप कहना यह देवों का अवर्णवाद है । ऐसे ही ये सब अवर्णवाद दर्शनमोहनीय के आस्रव के कारण होते हैं । अब चारित्रमोहनीय के आस्रव के कारण क्या-क्या हैं, यह बतलाते हैं―


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