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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-12

From जैनकोष



भूतब्रत्यनुकंपादानसरागसंयमादियोग: क्षांतिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ।। 6-12 ।।

(59) भूतानुकंपा और व्रत्यानुकंपा की सद्वेद्यास्रवहेतुता―भूतानुकंपा, व्रत्यनुंपा दान, सरागसंयम आदिक का योग क्षमा, पवित्रता ये सब सातावेदनीय के आस्रव के कारण होते हैं । इसमें 1-प्रथम कारण बताया है भूतानुकंपा । भूतों की अनुकंपा―अनुकंपा दया को कहते हैं, किसी दुःखी को देखकर उसके अनुसार दिल कंप जाना सो अनुकंपा है । भूत कहते हैं प्राणियों को । भूत शब्द बना है भू धातु से, जिसमें अर्थ यह भरा है कि आयु नाम कर्म के उदय से जो उन योनियों में होते हैं। जन्म लेते हैं वे सब प्राणीभूत कहते हैं। सर्व जीवों की दया करना सो भूतानुंपा है । इस जीवदया के परिणाम से सातावेदनीय कर्म का आस्रव होता है । जिसके उदयकाल में यह जीव भी साता पायगा । 2-दूसरा है व्रत्यनुकंपा―व्रती जनों पर अनुकंपा होना सो व्रत्यनुकंपा है । व्रत हैं 5―अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । इन व्रतों का जो संबंध बनाता है, इन व्रतों का जो पालन करता है वह व्रती कहलाता है चाहे गृहस्थ हो और चाहे गृहस्थों को छोड़कर निर्ग्रंथ दिगंबर हों, उन सब व्रतियों पर अनुकंपा होना व्रत्यनुकंपा है । यहां एक शंका यह हो सकती है कि जब पहले भूतानुकंपा कही जिसमें सर्व जीवों की दया आ ही गई तो व्रती अनुकंपा का शब्द अलग से करना व्यर्थ है । तो उत्तर इसका यह है कि भले ही सामान्य का निर्देश करने से सर्व विशेष भी आ गए, सब जीवों में व्रती भी आ गए फिर भी सर्व जीवों की अपेक्षा से व्रतियों की प्रधानता बतलाने के लिए व्रत्यनुकंपा शब्द अलग से कहा गया है, जिसका स्पष्ट अर्थ यह होता है कि जीवों में जो अनुकंपा की जाती है उसकी अपेक्षा व्रतियों में अनुकंपा करना प्रधानभूत है अर्थात् विशिष्ट है, श्रेष्ठ है, तो ऐसा प्रधान बतलाने के लिए व्रत्यानुपकंपा अलग से कहा है । अनुकंपा का अर्थ है अनुग्रह से भीगे हुए चित्त में दूसरे की पीड़ा का इस तरह अनुभव करना कि मानो मुझ ही में हो रही है । पीड़ा इस तरह अपने हृदय में पीड़ा करने पर जो अनुकंपन होता है, दयालु चित्त होता है, उस दुःख की वेदना होने लगती है वह कहलाती है अनुकंपा । अनुकंपा शब्द एक है और वह दोनों में लगना है, भूतों में अनुकंपा और व्रती जनों में अनुकंपा । सो पहले भूत और व्रती इन दो शब्दों का द्वंद्व समास किया गया है । 'भूतानि च व्रतिन: च इति भूत व्रतिनः' फिर इसमें तत्पुरुष समास किया गया । 'भूतव्रतिषु अनुकंपा भूतव्रत्यानुकंपा' । प्राणी और वृतियों में अनुकंपा होना ।

(60) दान व सरागसंयम की सद्वेद्यास्रवहेतुता―(3) तीसरा कारण बतला रहे हैं दान । दूसरे पर अनुग्रह बुद्धि होनेसे अपने वस्तु का त्याग करना दान कहलाता है । जैसे किसी प्राणी पर दया आयी अथवा किसी व्रती पर भक्ति उमड़ी तो उनकी सेवा के लिए अपने धन का परित्याग करना यह दान कहलाता है । (4) चौथा कारण बतला रहे हैं सरागसंयम । सराग का अर्थ है रागसहित । पहले उपार्जित किए गए कर्म के उदय से ऐसा संस्कार बना है, अभिप्राय बना है कि कषाय का निवारण नहीं हो सकता । फिर भी जो कषाय निवारण के लिए तैयार है ऐसा पुरुष सराग कहलाता है । यद्यपि सराग शब्द का सीधा अर्थ है रागसहित, किंतु इसके साथ संयम लगा होने से यह अर्थ ध्वनित हुआ कि यद्यपि राग का निवारण नहीं किया जा सकता फिर भी रागनिवारण के लिए जिसका लक्ष्य बना है, राग दूर करना चाहता है उसे कहते हैं सराग और संयम का अर्थ है प्राणियों की रक्षा करना या इंद्रिय विषयों में प्रवृत्ति न होने देना यह है संयम । भले प्रकार आत्मा में नियंत्रण करने को संयम कहते हैं । सो सराग पुरुषके संयम को सराग संयम कहते हैं अथवा राग सहित संयम को सराग संयम कहते हैं ।

(61) आदि शब्द से गृहीत अकामनिर्जरा संयमासंयम व बालतप की सद्वेद्यास्रवहेतुता―सरागसंयम के बाद आदि शब्द दिया है अर्थात् आदि लगाकर अन्य भी ऐसी ही बात सातावेदनीय के आस्रव का कारण होती है यह जानना । तो उस आदि शब्दसे क्या-क्या ग्रहण करना, उनमें से कुछ का नाम बतलाते हैं कि जैसे (5) अकामनिर्जरा―जीव स्वयं नहीं चाह रहा कि मैं ऐसा तप करूं या ऐसा उपसर्ग अपने पर लूं या दुःख का परिणाम बनाऊँ, फिर भी किसी परतंत्रता के कारण उपभोग का निरोध होना, ऐसी स्थिति आ जाये तो शांति से सह
लेना अर्थात् कोई उपद्रव आ जाये, भूखा रहना पड़े, गर्मी सहनी पड़े, कहीं पहुंच रहे, कुछ चाहते भी नहीं है ऐसा क्लेश, पर अगर आ गया है तो उसे शांति से सह लेना यह कहलाती है अकामनिर्जरा । (6) एक है संयमासंयम । कुछ निवृत्ति होना, सर्वथा पापसे तो निवृत्ति। नहीं है, पर एक देश पापसे हट जाना संयमासंयम कहलाता है । ये सब सातावेदनीय के आस्रव के कारण होते हैं । (7) एक है बालतप―मिथ्यादृष्टि जीवों के जो तप है, जैसे अग्निप्रवेश, पंचाग्नि तप, यह बालतप कहलाता है । ये भी सातावेदनीय के आस्रव के कारण हैं, मगर हैं ये
निकृष्ट कारणभूत । विशिष्ट सातावेदनीय का आस्रव नहीं है साधारणरूप से, क्योंकि उनके अज्ञान छाया है, जानकर समझकर विवेकपूर्वक कोई प्रवृत्ति नहीं है, लेकिन धर्म नाम की श्रद्धा है, मैं धर्म के लिए कर रहा हूं, ऐसी स्थिति में उन मिथ्यादृष्टि जनों का जो तपश्चरण आदिक है वह बालतप कहलाता है ।

(62) योग क्षांति व शौचभाव की सद्वेद्यास्रवहेतुता―(8) योग―निर्दोष क्रिया करने का नाम योग है । अर्थात् पूर्व उपयोग से जुट जाना, दूषण से हट जाना । इसके अतिरिक्त (9) क्षमाभाव भी सातावेदनीय के आस्रव का कारण है । शुभ परिणाम से क्रोधादिक हटा देना क्षमा कहलाता है । इस क्षमासे सातावेदनीय का आस्रव होता जिसके कारण आगे इन कर्मों का उदय होने पर इस जीव को साता मिलेगी । (10) एक कारण है शौच, पवित्रता―लोभ के प्रकारों से अलग हो जाना शौच है, जिस लोभ के मुख्य तीन प्रकार हैं―अपने द्रव्य का त्याग न कर सकना, दूसरे के द्रव्य का हरण कर लेना, और किसी की धरोहर को हड़प जाना और भी अनेक प्रकार हैं । पर एक व्यवहार में लोभीजनों की जैसी वृत्ति होती है उसके अनुसार कह रहे हैं । एक तो ऐसे लोभी होते जो स्वद्रव्य का त्याग नहीं कर सकते धन खर्च नहीं कर सकते, एक ऐसे लोभी होते हैं कि जो दूसरे के द्रव्य का भी हरण करना चाहते हैं व करते हैं, और एक ऐसे लोभी कि जिनके पास कोई अपनी चीज रख जाये तो उसको हड़पना चाहते और हड़प लेते हैं । इस प्रकार लोभ का परित्याग करना शौच भाव है । ऐसी वृत्ति अर्थात् ऐसे ऐसे अन्य भाव भी साता वेदनीय के आस्रव के कारण हैं ।

(63) सूत्रोक्त सब परिणामों का समास करके एक पद न करने का कारण एवंविध अन्य भावों का संग्रहण―इस सूत्र में बात दो ही तो कही गई हैं कि ऐसी ऐसी बातें साता वेदनीय आस्रव के कारण हैं । तो केवल दो ही पद होने चाहिएँ थे सो उस एक पद को जिसमें सारी घटनायें बतायी हैं आस्रव के कारणभूत उनके लिए तीन पद किए गए हैं और फिर इति शब्द भी लगाया है । उनका समास क्यों नहीं किया गया, समास कर देते तो सूत्र में लघुता आ जाती । यहाँ एक ऐसी शंका होती है । उसका उत्तर यह है कि अलग-अलग कुछ पद यों लगाये कि ऐसे अन्य भाव भी संग्रहीत कर लिए जाये मायने इतने भाव तो सूत्र में बताये हैं पर ऐसे ही अन्य भाव हैं जो सातावेदनीय के आस्रव के कारण होते हैं, और इसी प्रकार यह भी प्रश्न हो सकता कि इति शब्द लिखना भी व्यर्थ है । तो एक तो समास न करके अलग-अलग लिखा और एक इति शब्द लिखा तो यह कुछ अनर्थक सा होकर सार्थकता को घोषित करता है । अर्थात् अन्य का भी संग्रह करना । वह अन्य क्या-क्या है जिसका यहां संग्रह किया जाना चाहिए । तो सुनो―अरहंत प्रभु की पूजा, यह परिणाम साता वेदनीय के आस्रव का कारण है । वयोवृद्ध तपस्वीजनों की सेवा यह परिणाम साता वेदनीय के आस्रव का कारण है । छल कपट न होना, सरलता बनी रहना, किसी को लोंधा पट्टी की बात न कहना ऐसी स्वच्छता साता वेदनीय के आस्रव का कारणभूत है । ऐसे ही विनयसंपन्नता पर जीवों का आदर करना सबके लिए विनयशील रहना यह भी साता वेदनीय के आस्रव का कारण है ।

(64) नित्यत्व या अनित्यत्व के एकांत में परिणामों की अनुपपत्ति―यहां एक दार्शनिक बात समझना कि जीव को जो लोग सर्वथा नित्य मानते हैं, उनके ये बातें घटित नहीं हो सकती याने दया करना, दान करना, संयम पालना आदिक बातें जीव को सर्वथा नित्य मानने वाले में घटित नहीं हो सकती और आत्मा से सर्वथा भिन्न, क्षणिक मानने में भी ये सब घटित नहीं हो सकते । जीव द्रव्यदृष्टि से नित्य है पर्यायदृष्टि से अनित्य है । ऐसा जीव का स्वभाव है । बना रहता है और परिणमता रहता है । तो ऐसे जीव के अनुकंपा आदिक परिणाम विशेष होते हैं । पर केवल नित्य हो तो परिणति ही नहीं, दया आदिक कहाँ से हो सके? एक अनित्य हो । एक समय को ही आत्मा है फिर नहीं है तो वहाँ करुणा, दान आदिक कैसे संभव हो सकते? सर्वथा नित्य मानने वालों के यहां तो विकार माना ही नहीं गया, उनमें कुछ बदल परिणमन जब नहीं माना गया तो दया आदिक कैसे हो सकते? और यदि दया आदिक मान लिये जायें तो वे सर्वथा नित्य कहां रहे? इसी तरह जो क्षणिक एकांत का सिद्धांत मानते हैं तो उनका ज्ञान तो क्षणिक रहा और दया आदिक तब ही बनते जब पहली और उत्तर पर्याय का घटना का ग्रहण किया जाये । सो यह बात क्षणिक में कैसे बनेगी सो अनुकंपा भी नहीं बन सकती । इससे जीव नित्यानित्यात्मक है तब ही तो वहां अनुकंपा आदिक के परिणाम बनते हैं । इस प्रकार सातावेदनीय के आस्रव के कारण बताये । अब इसके अनंतर मोहनीय कर्म का नंबर है जैसा कि सूत्र में ही क्रम दिया जायेगा । सो मोहनीय के दो भेद हैं―1-दर्शनमोहनीय और 2-चारित्रमोहनीय जो आत्मा के सम्यक्त्वगुण को प्रकट न होने दे वह है दर्शनमोहनीय और जो आत्मा में चारित्रगुण को न प्रकट कर सके सो है चारित्रमोहनीय । तो उसमें दर्शनमोहनीय के आस्रव के कारण बताये जा रहे हैं ।


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