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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-19

From जैनकोष



नि:शीलब्रतत्वं च सर्वेषाम् ।।6-19 ।।

(76) शीलव्रतरहित स्थिति के परिणामों के तीन व चारों में से किसी भी आयु के आस्रव की कारणता―शील और व्रत से रहितपना सभी आयु के आस्रवों का कारण है । अर्थात् शील न हो, व्रत न हो तो ऐसी स्थिति में सभी आयु का आश्रय हो सकता है । यहां सभी जीवों को कहा, उससे चारों गतियों के जीव न लेना, किंतु नरकायु, तिर्यंचायु और मनुष्यायु इन तीन आयु का आस्रव होता है यह लेना, क्योंकि अब तक जितनी आयु बतायी गई हैं उनका ही ग्रहण होगा । यहां यह एक और शंका होती है कि उस सूत्र को भी योग से क्यों कहा? तो अलग से कहने का अर्थ यही है कि यह तीन आयु के लिए कहा गया है । यदि आयु
के आस्रव के लिए ही कहा जाता होता तो सर्वेषां शब्द न देना चाहिए था तथा सूत्र भी अलग न बनाया जाना चाहिए था । तो इस सूत्र का अर्थ तीनों आयु में लगता है । दूसरी बात यह है कि यह सूत्र जो अलग बनाया गया सो उससे देवायु का भी ग्रहण तो किया जा सकता मगर भोगभूमि में रहने वाले मनुष्य तिर्यंचों की अपेक्षा अर्थ लगेगा अर्थात् भोगभूमि के तिर्यंच और मनुष्यों में शील और व्रत दोनों ही नहीं होते लेकिन वे देवगति में ही जाते हैं, तो उनके देवायु का आस्रव है यह बात दिखाने के लिए सर्वेषां शब्द ग्रहण किया गया है । अब तीन आयु
के आस्रव का विधान कहने के पश्चात् देवायु का विधान बतलाते हैं ।


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