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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-20

From जैनकोष



सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य ।। 6-20 ।।

(77) देवायु के आस्रव के कारणों में सराग संयमादि मुख्य कारणों का निर्देश―सरागसंयम, संयमासयम, अकामनिर्जरा और बालतप ये देवायु के आस्रव के कारण होते हैं । सरागसंयम का अर्थ है मुनियों का शुभोपयोगरूप चारित्र । ज्ञानसहित संयमको सरागसंयम कहते हैं अथवा रागसहित जीव के संयम को सरागसंयम कहते हैं । अरहंत आदिक में भक्ति जगना, साधर्मी भाइयों में प्रीति जगना, उपवास आदिक में भावना होना ये सब शुभोपयोग कहलाते हैं । तो ऐसे शुभोपयोगियों के संयम सराग संयम कहलाता । तो सराग संयम का पालन देवायु के आस्रव का कारण होता है । जितने भी मुनिजन हैं वे देवायु का ही आस्रव करते हैं अर्थात् मुनिजन या तो मोक्ष जायेंगे या देवगति में उत्पन्न होंगे, पर सच्चा-सच्चा मुनि होता है भावमुनि । मानो किसी पुरुष ने पहले नरकायु, तिर्यंचायु व मनुष्यायु का बंध कर लिया तो उसके महाव्रत धारण करने के परिणाम न होंगे । जिसने देवायु का बंध किया हो या किसी भी आयु का बंध न किया हो उसके महाव्रत ग्रहण करने के परिणाम होते हैं । वह महाव्रत ग्रहण करता है । तो जिसने देवायु का बंध किया और मुनि बना उसके तो निश्चित ही हो गया कि वह मरकर देवगति में उत्पन्न होगा, पर जिसके किसी आयु का बंध न था और मुनि हो गया तो मुनि हुए बाद यदि आयु का बंध होता है तो देवायु का ही बंध होता है । तो इस प्रकार सराग संयम देवायु के आस्रव का कारण है । संयमासंयम―श्रावक के व्रतों को संयमासंयम कहते हैं । ऐसा व्रत परिणाम कि जहां कुछ संयम है और कुछ असंयम है । वह संयमासंयम है । संयमासंयम का भी यही नियम है । जिस मनुष्य या तिर्यंच ने पहले देवायु का बंध किया हो उसके या जिसने किसी भी आयु का बंध न किया हो उसके संयमासंयम होता है औंर जिस किसी के संयमासंयम हो गया और किसी भी आयु का बंध नहीं किया तो अब आयु का बंध होगा ही तो वह देवायु का ही बंध होगा । तो इस प्रकार संयमासंयम भी देवायु के आस्रव का कारण है । अकामनिर्जरा कोई दुःख उपस्थित होने पर उसे समता से सहना सो अकाम निर्जरा है । यह अकामनिर्जरा―देवायु के आस्रव का कारण है । बालतप― अज्ञान अवस्था में धार्मिक बुद्धि करके पंचाग्नि आदिक अनेक प्रकार के जो तपश्चरण किए जाते हैं वे बाल तप कहलाते हैं । देवायु के आस्रव के ये कारण सामान्यरूप से कहे गए हैं ।

(78) सौधर्माद्यायु के आस्रव के कारणों का प्रपंच―कुछ विशेष रूप से इस प्रकार समझना कि सौधर्म आदिक स्वर्ग की आयु के आस्रवरूप परिणाम ये हैं । कल्याण चाहने वाले मित्रों का साथ रखना, ऐसे मित्रों का संघ बनाना जो सब कल्याण की इच्छा रखने वाले हों । आयतन सेवा जो धर्म के स्थान हैं मंदिर, गुरुसेवा, साधर्मी
बंधु व्रती पुरुष इनकी सेवा करना आयतनसेवा है । उत्कृष्ट धर्म का स्रवण करना । जो उपाय दुःख से हटाकर सुख में पहुंचाये वह सद्धर्म है । जो वस्तु में स्वभाव है वह उस वस्तु का धर्म है । आत्मा का स्वभाव ज्ञानरूप है । उसकी दृष्टि करना, उसका आश्रय लेना सो सद्धर्म है । सद्धर्म की वार्ता सुनना सद्धर्म स्रवण है । ये सब सौधर्मादिक स्वर्ग के आयु के आस्रव हैं अर्थात् देवायु तो बँधती है पर उनमें भी सौधर्म आदिक स्वर्गों में उत्पन्न हों उतनी आयु बंधती है । स्वगौरव दर्शन―अपने आत्मा का गौरव निरखना, अभिमान नहीं किंतु गौरव, अभिमान में तो दूसरे के प्रति तुच्छता का परिणाम होता है, पर गौरव में दूसरे के प्रति तुच्छता का भाव नहीं हैं किंतु अपने गुणों पर गौरव है । और उस आत्मा के सहज गुण हैं कारण समयसाररूप उनका आश्रय तो मोक्षमार्ग ही कहलाता है । निर्दोष प्रोषधोपवासता―उपवास प्रोषध पूर्वक उपवास यह निरतिचार चलता है । ऐसा परिणाम रहना, तप की भावना, अनशन आदिक तप करे और प्रसन्न होकर करे और तपश्चरण करने की भावना रहे सो तपभावना है । बहुश्रुतपना―आगम का खूब अभ्यास होना, तत्त्वों की जानकारी होना बहुश्रुतपना हैं । आगमपरता―आत्मा का ज्ञान और आगम में बताये हुए तत्त्वों का चिंतन मनन उस ही में उपयोग रखना आगमपरता है । कषायनिग्रह―क्रोध, मान, माया, लोभ इन कषायों को वश करना । कदाचित् कषाये आये तो ज्ञान के बल से उन्हें तोड़ देना सो कषायनिग्रह है । ये सब परिणाम सौधर्म आदिक स्वर्ग के आयु के आस्रव के कारण हैं । पात्रदान―रत्नत्रय के धारी दिगंबर मुनि उत्तम पात्र कहलाते हैं । भक्तिपूर्वक सुपात्रदान करना, सेवा करना पात्रदान है, पीत और पद्यलेश्या के परिणाम होना, जो धर्म से संबंध रखता है, समता परिणाम में बढ़ता है वे सब परिणाम सौधर्मादिक स्वर्ग की आयु के आस्रव है । मरण समय में समाधिमरण, धर्म ध्यान की प्रवृत्ति आत्मभावना और भी धर्मभावना, तीर्थक्षेत्र का स्मरण तीर्थंकरों का स्मरण परमात्मा का स्मरण, आत्मस्वरूप का स्मरण यों मरण के समय धर्मध्यानरूप प्रवृत्ति रहे वे सौधर्मादिक स्वर्ग की आयु के आस्रव हैं ।

(79) भवनाद्यायु के आस्रव के कारण―कुछ परिणाम भवनवासी आदिक के आस्रव करने वाले हैं । जैसे अव्यक्त सामायिक करना, पर उसमें भी कुछ भी बोलचाल या अन्य क्रिया जिससे कि वह सामायिक व्यक्त नहीं होती ऐसा परिणाम, और सम्यग्दर्शन की विराधना सम्यक्त्व है । पर उसका घात हो जाये, सम्यक्त्व मिटने लगे ऐसा परिणाम भवनवासी आदिक के आयु के आस्रव के कारण है ।

(80) विभिन्न स्वर्गादिकों की आयु के आस्रव के कारणों का प्रपंच―कुछ परिणाम प्रथम स्वर्ग से लेकर अच्युतस्वर्ग अर्थात् 16 वें स्वर्ग तक के देवों में उत्पन्न हों, ऐसे देवायु के आस्रव के कारण बनते हैं । जैसे पंचअणुव्रत का धारण करना, ऐसा सम्यग्दृष्टि तिर्यंच होना या मनुष्य होना जो पंच अणुव्रत का धारण करे तो उसका प्रथम स्वर्ग से लेकर 16 वें स्वर्ग पर्यंत तक के देवों में उत्पन्न होने लायक देवायु का आस्रव होता है । हाँ उन जीवों के जो अणुव्रत धारक हैं, सम्यग्दर्शन की विराधना हो जाये, सम्यक्त्व नष्ट हो जाये, मिथ्यात्व में आये तो स्वर्गों में न जाकर भवनवासी आदिक में उत्पन्न होता है । कुछ ऐसे संन्यासीजन जिन्होंने घर छोड़ रखा, जो जंगल में रहते हैं, पर बाल तप तपा करते हैं, तत्त्वज्ञान से रहित हैं, अज्ञानी हैं, पर मंदकषाय हैं, उस मंद कषाय के कारण अनेक बाल तप तपने वाले संन्यासीजन भवनवासी से लेकर 12 वें स्वर्ग पर्यंत उत्पन्न होते हैं । उनके उस प्रकार के देवायु का आस्रव हो ही, यहाँ यह नियम नहीं है कि वह देव में हो जाये । कोई मरकर मनुष्य भी होते, तिर्यंच भी हो जाते, पर देवायु बंधे तो उस प्रकार बंधे यह बात यहाँ बतायी जा रही है । इन्हीं कारणों जैसे कुछ कारण हैं जिनसे देवायु न बंधकर मनुष्य, तिर्यंच और व्यंतरो में उत्पन्न हो लेते हैं ।

(81) व्यंतरों संबंधित आयु के आस्रवों के कारण―तो व्यंतरों में उत्पन्न हो सके ऐसा परिणाम, यह है अकाम निर्जरा । भूख प्यास का सहना, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी पर सोना, मल धारण याने शरीर पर मल हो तो उसे भी न छुटाये, ऐसे परीषहों से खेदखिन्न न होना, किन्हीं मूढ़ गुप्त पुरुषों के बंधन में पढ़ने पर भी न घबड़ाना । बहुत काल से बीमार चले आ रहे ऐसे रोग में भी संक्लेश परिणाम न करना । पर्वत के शिखर से धर्म मानकर झंझापात गिर जाना, अनशन करना, अग्नि में प्रवेश करना विष भक्षण करना, इनको ही धर्म मानें और धर्म मानकर ये किए जायें तो ऐसे संन्यासी कुतपी व्यतरों में उत्पन्न होते हैं और कुछ मनुष्य तिर्यंचों में भी हो सकते हैं । जिन पुरुषों ने शील या व्रत का धारण नहीं किया, किंतु दयावान हृदय के हैं, जलरेखा की तरह मंद कषाय हैं, जैसे जल में लाठी से रेखा की जाये तो वह तुरंत समाप्त हो जाती है इतनी मंद कषाय है, ऐसा कोई भोगभूमि का जीव है वह देवों में तो होगा, मगर यह शील की तरफ जरा भी दृष्टि न होने से व्यंतर आदिक में उत्पन्न होता है । यद्यपि भोगभूमि में शील और व्रत का नियम किसी के नहीं होता, पर भावों में अनेकों के धर्मदृष्टि रहती है । जिनके धर्म की दृष्टि भी नहीं ऐसे भोगभूमिज व्यंतर आदिक मे उत्पन्न होते हैं । अब आयु के आस्रव के कारणों में एक अंतिम सूत्र कहते हैं ।


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