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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-26

From जैनकोष



तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ।।6-26।।

(99) उच्चैर्गोत्रकर्म के आस्रव के मुख्य कारण―उससे उल्टा तथा विनय से नम्र होना एवं धमंड न करना ये उच्च गोत्र के आस्रव के कारणभूत हैं । तद्विपर्यय:, इस प्रथम पद में तत् शब्द से अर्थ लिया नीच गोत्र जिसका कि वर्णन इससे पहले सूत्र में आ गया है । ग्रहण हुआ याने नीच गोत्र के, आस्रव के कारण से उल्टा । नीच गोत्र के आस्रव बताये गए थे―पर निंदा, आत्मप्रशंसा, तो यहां लेना है परप्रशंसा, आत्मनिंदा । दूसरे पुरुषों के गुणों की प्रशंसा करने से उच्च गोत्र का आस्रव होता है, जिसके उदय में वह उच्च गोत्र में उत्पन्न होगा । अपनी निंदा करने से अर्थात् अपने में जो त्रुटि है, दोष है, विषय कषाय संबंधी वृत्ति है, और और भी जो व्यवहार के योग्य हैं, ऐसे हीन आचार को निरखकर अपनी निंदा करना यह मेरे को उचित नहीं है । स्वयं भी सोचना और दूसरे लोगों को भी बताना कि मेरे में यह दोष लगा है आदिक ये सब आत्मनिंदा उच्च गोत्र के आस्रव का कारण है । नीच गोत्र के आस्रव में बताया था कि दूसरे के गुण हों या न हों उनको ढांक देना तथा अपने में गुण हों या न हों उनको प्रकट करना, ढिंढोरा पीटना, तो यही उच्च गोत्र के आस्रव में कारण जानना, दूसरे के गुण हों या न हों उनको प्रकट करना और आत्मा के गुण हों या न हों उनको ढांकना अथवा यहां सत् और असत् को भी क्रम से लगाना जिससे अर्थ निकलता है कि दूसरे के सद्भूत गुणों को प्रकट करना और अपने असद्भूत गुणों को ढाकना, तात्पर्य यह है कि दूसरे के गुणों को बखानना उच्च गोत्र के आस्रव का कारण है और अपने गुणों को ढांकना, प्रकट न करना, न कहना उच्च गोत्र के आस्रव का कारण है । इसके अतिरिक्त दो कारण और कहे गए हैं―(1) नींचैर्वृत्ति, (2) अनुत्सेक । जो पुरुष गुणों में उत्कृष्ट हैं उनके प्रति विनय से झुक जाना, अपने को नम्र कर देना सो नीचैर्वृत्ति है । दूसरे के गुणों को ध्यान में लेने से ज्ञेयाकार भी गुण रहा और गुण रुचि होने से स्वयं के गुण में भी विकास का प्रारंभ होता है । गुणी पुरुषों के प्रति नम्र होने से आत्मा के ज्ञानस्वभाव का बाधक अहंकार दूर हो जाता है, इस कारण नम्रता में मोक्षमार्ग भी मिलता है और संसार में जब तक रहना पड़ता है तब तक उसके उच्च गोत्र का आस्रव होता है । अनुत्सेक―अहंकार न होना सो अनुत्सेक है । ज्ञानादिक में उत्कृष्ट होने पर भी उस ज्ञानादिक का लक्ष्य कर मोही जनों को मद होता है, वह मद इसके नहीं है, यही है अनुत्सेक । ये सब परिणाम उच्च गोत्र के आस्रव के कारणभूत हैं ।

(100) उच्चैर्गोत्रकर्म के आस्रवों के कारणों पर अनतिविस्तृतविवरण―सूत्र में जो परिणाम बताये गए हैं उनके विस्तार में इम प्रकार समझना कि जाति, कुल, बल, रूप, ज्ञान, ऐश्वर्य, तप आदिक की विशेषता होने पर भी उनका अहंकार न होवे तो वे सब शुद्ध परिणाम उच्च गोत्र के आस्रव के कारण हैं । दूसरे का तिरस्कार न करना उच्च गोत्र आस्रव कराता है, दूसरे का तिरस्कार उससे ही संभव नहीं है जो अपने आत्मस्वरूप को जानता है और सब जीवों में इस ही स्वरूप को निरखता है । सभी प्राणी स्वरूपत: एक समान हैं ऐसा बोध होने पर दूसरे के तिरस्कार की भावना कैसे हो सकती? ऐसा उच्च परिणाम उच्च गोत्र के आस्रव के कारणभूत है । अपने में उद्धतता न होना अर्थात् उद्धतपन उजडुता का अभाव होना, दूसरे से ईर्ष्या न करना, दूसरे का उपहास न करना, दूसरे का अपयश न करना, यह उच्च गोत्र का आस्रव कराता है । साधर्मी व्यक्तियों का सम्मान करना, गुणी पुरुषों को निरखकर खड़े होना, अंजुलि चढ़ाना, नमस्कार करना ऐसा यह नम्र परिणाम उच्च गोत्र का आस्रव कराता है । निर्हंकार नम्र वृत्ति होना, सरलता होना, सब जीवों के सुखी होने की भावना रखना, अपने में सदैव नम्रता रहना, उच्च गोत्र का आस्रव कराता है । राख में ढकी हुई अग्नि जैसे अंदर ही पड़ी है, उसका प्रकाश प्रताप अंदर ही है, बाहर में उसका ढिंढोरा नहीं पिट पाता, ऐसे ही अपने में कोई गुण हों तो वे अपने में ही बने रहें, उनको बाहर में ढिंढोरा न पीटें, ऐसा जो नम्र परिणाम है वह उच्च गोत्र का आस्रव कराता है, धर्म के जितने स्थान है उनमें आदर बुद्धि न होना, जैसे मंदिर जी, उसकी सफाई, रक्षा, सजावट में प्रीति होना यह धर्मगुरु और धर्मदेव के प्रति बहुमान का सूचक है और धर्म साधन की रक्षा है । धर्म के स्थान मुख्य रूप से धर्मज्ञान देने वाले विद्यालय, पाठशालायें हैं, उनके करने का भाव, विद्यार्थियों के ज्ञान के साधन जुटाने के भाव ये सब परिणाम उच्च गोत्र का आस्रव कराते हैं । धर्म के साधनभूत अन्य समारोह आदिक भी होते हैं, उनमें भी आदर रखना प्रौर प्रभु जिनेंद्र के मार्ग की प्रभावना हो रही है, ऐसा प्रसन्नता का भाव रखना, ये सब उच्च गोत्र के आस्रव के कारणभूत है ।


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