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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-27

From जैनकोष



विघ्नकरणमंतरायस्य ।।6-27।।

(101) दानादि में विघ्नकरण की अंतरायास्रवहेतुता―विघ्न करना अंतराय के आस्रव का कारण है । किनमें विघ्न करना ? दान आदिक जो शुभ क्रियायें हैं उनमें विघ्न करना अंतराय का आस्रव कराता है । दान आदिक का निर्देश पहले सूत्र में कर दिया है । वे 5 होते हैं 1-दान 2-लाभ 3-भोग 4-उपभोग और 5-वीर्य । इनका हनन करना विघ्न कहलाता है । विघ्न शब्द में वि तो उपसर्ग है और हन् धातु से घन् प्रत्यय होकर विघ्न शब्द बना है । तो विघ्न कहलाता है किसी कार्य का प्रतिघात कर देना, रोक देना, कार्य का न होने देना सो विघ्न अंतराय कर्म का आस्रव कराता है । इस सूत्र में मूल रूप से तो 5 बातें कही गई हैं 1-दानमें विघ्न करना―कोई दान देता हो उसको रोक देना, चाहे संकेत से रोके चाहे किन्हीं वचनों से रोके चाहे कायचेष्टा से रोके इससे दानांतराय का आस्रव होता है । जिसके उदय में इसे खुद लाभ न होगा और इसके भी दान का भाव न हो सकेगा । लाभांतराय―किसी के लाभ में अंतराय डालना, कुछ वस्तु किसी को प्राप्त होती हो उद्यम से या अन्य प्रकार से, उसमें विघ्न डाल देना यह लाभांतराय का आस्रव कराता है । भोगांतराय भोग की वस्तुवें, विषयों के साधनभूत जो पदार्थ एक बार भोगने में आये ऐसे भोजन आदिक उनके भोगने में विघ्न डालना भोगांतराय का आस्रव कराता है । उपभोगांतराय―उपभोग की वस्तुवों में विघ्न डालना । उपभोग वाले पदार्थ वे कहलाते हैं जो बार-बार भोगने में आयें । जैसे कुर्ता कमीज, बर्तन आदिक जो रोज-रोज भोगने में आते हैं । तो ऐसे उपभोग वाले पदार्थों में विघ्न करना उपभोगांतराय है । वीर्यांतराय वीर्य अर्थात् शक्ति, उसके प्रकाशन में प्रकट करने में विघ्न डालना, किसी की शक्ति के साधनों में विघ्न डालना वीर्यांतरायकर्म का आस्रव कराता है । इस प्रकार ये मूल रूप से न कारण बताये गए हैं । अब इनके विस्तार में अन्य कारण का कथन करते हैं ।

(102) ज्ञानप्रतिषेध आदि कुछ परिणमनों की अंतरायास्रवहेतुता―किसी के ज्ञान का प्रतिषेध कर देना । कोई ज्ञान की चर्चा कर रहा हो, दूसरे ज्ञानी के ज्ञान की प्रशंसा कर रहा हो अथवा कोई ज्ञान दे रहा हो तो वहाँ उस ज्ञान का निषेध कर देना, उसकी अनावश्यकता बताकर अथवा ज्ञान के दोष बताकर किसी भी उपाय से ज्ञान का निषेध कर देना अंतराय कर्म का आस्रव कराता है । किसी के सत्कार का विनाश कर देना, कोई अभ्यागत आया है या विद्वान साधु संत पुरुष आया है और उसका लोग विशेष सत्कार करने की उद्यम कर रहे हैं तो उसमें विघ्न डालना उसे न होने देना, ऐसे वचन बोलना कि जिससे लोंगों को उससे उपेक्षा हो जाये तो यह सत्कारोपघात कहलाता है । इससे अंतरायकर्म का आस्रव होता है । कोई दान देता हो उसके दान में विघ्न करना, अनावश्यक है या यह पात्र नहीं है यह व्यर्थ जायेगा या इतनी गुंजाइस कहां है, कैसा ही समझकर उस दान में विघ्न करना, किसी के लाभ में विघ्न करना, किसी उद्यम से कुछ प्राप्ति होने वाली हो तो उसमें अड़चन लगा देना, भोगोपभोग वीर्य में विघ्न डालना, स्नान में अंतराय करना, स्नान भी तो एक भोग वाली बात है जिसमें लोग प्रसन्न रहा करते हैं और जिससे लोग सुख अनुभव करते हैं, उनके स्नान में बाधा डालना जैसे पानी लुढ़का दे या प्रतिकूल बात बोल दे । अनुलेपन में विघ्न करना, जैसे शरीर में कोई मालिस की जाती हो, कोई गंध वाली चीज का लेप किया जाता हो तो ऐसी क्रियावों मे लोग सुख साता का अनुभव करते हैं । उनके ऐसा शौक होता है, पर कोई उनकी इस बात में विघ्न डाल दे तो वह अंतराय के आस्रव के कारण होता है, ऐसे ही गंध माल्य भूषण वस्त्र आदिक में विघ्न डालना, किसी के शयन में (सोने में) विघ्न डालना सोने न देना, बीच में ही जगा देना अथवा शयन का साधन मिटा देना ऐसे ही आसन का साधन मिटा देना, बैठने को स्थान न देना ये सभी विघ्न अंतराय कर्म का आस्रव कराते हैं ।


(103) भक्ष्यभोज्यविघ्नकरणादि कतिपय परिणमनों की अंतरायास्रवहेतुता―जो पदार्थ भक्ष्य हैं, भोज्य हैं, लेह्य हैं और पेय हैं उन पदार्थों के भोगने में विघ्न डालना । भक्ष्य पदार्थ वे कहलाते हैं जिन पदार्थों के खाने से पेट भरे, रोज खाये जायें, जैसे दाल, रोटी, चावल आदि । भोज्य पदार्थ वे कहलाते हैं कि जो रोज भरपेट तो नहीं खाये जा सकते, पर उनकी रुचि होती है, स्वादिष्ट लगते हैं । कुछ भूख भी मिटती है जैसे लड्डू, पेड़ा बरफी आदिक, लेह्य पदार्थ वे कहलाते हैं जो चाटकर खाये जाते, जैसे चटनी और पेय पदार्थ वे कहलाते जो पिये जाते, जैसे ठंडाई, दूध, पानी आदिक । इन पदार्थों का कोई भोग करता हो या भोग करने का उद्यम करता हो तो उसके भोगने में बाधा डालना, ये सब अंतराय कर्म के आस्रव कराते हैं । किसी का वैभव देखकर अथवा किसी की समृद्धि को निरखकर उसमें विस्मय करना―कैसे मिला है, कैसे मिल गया है उसका आश्चर्य बनाना यह अंतराय का आस्रव कराता है, क्योंकि इतना ज्ञान नहीं है कि ये सब बाहरी पदार्थ हैं, इनका आत्मा से क्या संबंध है? ये तो ऐसे ही दुनिया में पड़े रहते हैं । कुछ पुण्य का उदय है कि जिसे वह इष्ट समझता है उसका समागम हो जाता है, पर ये सब कलंकरूप हैं । उस पर क्या आश्चर्य करना? ऐसा ज्ञान नहीं है किंतु खुद उस का लोभी है । और, दूसरों को प्राप्त हो तो उसमें विस्मय है, और वह विस्मय भी अपने भीतर एक ऐसा न मिलना चाहिए था, इस भाव को लिए हुए है । सो यह भी अंतराय का आस्रव कराता है । द्रव्य का त्याग न करना―खुद के पास धन वैभव का खूब साधन है, पर दूसरों के उपयोग के लिए उसका व्यय न कर सकना और केवल खुद के और अपने परिणमन के लिए ही यह द्रव्य है ऐसा निर्णय बनाये रखना, ऐसी कृपणता अंतराय का आस्रव कराती है । द्रव्य के उपयोग के समर्थन में प्रमाद करना, कोई देता हो वह न सुहाये, कोई पदार्थ का उपयोग करता हो तो उसका साधन बनाने में प्रमाद बनाना देवतावों के लिए जो निवेदित किया गया अर्थात् नैवेद्य चढ़ाया गया या जो नैवेद्यरूप से नहीं, किंतु व्यवस्था के रूप से रखा गया ऐसे द्रव्य को ग्रहण करना अर्थात् मंदिर, संस्था आदिक के द्रव्य को हड़प लेना यह सब अंतरायकर्म का आस्रव कराता है । कोई निर्दोष उपकरण हों किंतु मन के माफिक सजे धजे शौक शान वाले न हों तो उनका त्याग करना, दूसरे की शक्ति को मिटाना, धर्म में विच्छेद डालना ये सब अंतराय के आस्रव के कारण हैं ।

(104) तपस्विगुरुचैत्यपूजाव्याघात आदि परिणमनों की अंतरायास्रवहेतुता―कोई तपस्वी गुरु उत्तम चारित्र वाले हैं और उनका लोग पूजा सत्कार करते हैं तो वह न सुहाये और उनकी पूजा में विघ्न डाले अथवा मंदिर आदि में, मूर्ति चैत्य की पूजा में विघ्न डाले, कोई पुरुष किसी दीक्षित, साधु को कोई द्रव्य दे रहा है या असमर्थ दीन को कोई द्रव्य दिया जा रहा है तो ऐसे दिए जाने वाले वस्त्र, पात्र आदिक में विघ्न करना वे अंतराय के आस्रव के कारण हैं । दूसरे पुरुषों को रोक देना, किसी जगह बंद कर देना, किसी चोर को बाँधना, जो गुह्य अंग हैं उनका छेदन करना, कान, नाक, ओंठ आदिक का काट देना, किसी प्राणी का वध करना, ये सब अंतराय कर्म का आस्रव कराते हैं । इस सूत्र में और इससे पहले वाले आस्रव प्रसंग के सूत्रों में जो अनेक कारणों का ग्रहण किया गया है सो वह इति शब्द की अनुवृत्ति से किया गया है । सर्वप्रथम सातावेदनीय के आस्रव का कारण बताने के लिए सूत्र कहा गया था―भूतवब्रत्यनुकंपादि, उसमें इति शब्द पड़ा है । जो कारण कहने थे वे कारण तो कह दिये और इसके बाद इति शब्द आया है, जैसे क्षमा, पवित्रता आदिक । सो उस इति शब्द का आगे के सब सूत्रों में प्रकाश आ रहा है और उस इति शब्द द्वारा वह सब ग्रहण किया जा रहा है । आस्रव का वर्णन करने वाले इस छठे अध्याय में इस अंतिम प्रसंग में आगे कर्मों के आस्रव के कारण बताये हैं सो इन आस्रव की विधियों से ज्ञानावरणादिक अष्ट कर्मों का आस्रव बंध होता है । जैसे कि कोई शराबी नशा लाने वाले मदिरा को पीकर उसके नशे में अनेक विकारों को करता है अथवा कोई रोगी जिस अपथ्य आहार से रोग बढ़ता है उसी अपथ्य आहार को बड़ी रुचि से खा लेता है तो उसके बात, पित्त, कफ आदिक अनेक रोग विकार उत्पन्न होते हैं, ऐसे ही यह जीव आस्रव करने वाले इन उपायों से ज्ञानावरणादिक अष्टकर्मों का आस्रव कराता है और नाना संस्कार विकारों को प्राप्त होता है ।

(105) सूत्रोक्त आस्रवहेतुवाचक शब्दों में आस्रवहेतुत्व के हेतु की झांकी―यहाँ कोई यह शंका करता है कि आस्रव के कारण तो बताये गए बहुत, पर उनके साथ हेतु नहीं बताया गया कि ऐसा करने से इन कर्मों का आस्रव क्यों होता? उसका कारण क्या है? तो जब हेतु नहीं बताया गया तो इस आस्रव का नियम सिद्ध नहीं होता, पुष्टता नहीं आती कि ऐसा करने से अमुक पदार्थ का आस्रव होता ही है । जो भी वर्णन हेतुपूर्वक होता है वही विद्वानों के द्वारा ग्राह्य होता है । तो यहाँ हेतु न कहने से यह आस्रव का कथन प्रामाणिक कथन नहीं बन सकता । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि कितने ही प्रकरण ऐसे होते है कि उनका हेतु उन शब्दों के बोलने से ही सिद्ध हो जाता है । जैसे कहा कि किसी के ज्ञान से ईर्ष्या करना, ज्ञान के साधनों में विघ्न डालना ज्ञानावरण का आस्रव कराता है तो उसके सुनते ही हेतु मन में आ जाता है कि जब दूसरे के ज्ञान से ईर्ष्या कर रहे तो इसको भी ज्ञान न मिले, ऐसे कर्मों का आस्रव होगा ही । तो कितनी ही बातें ऐसी होती हैं कि जो एकदम सिद्ध हैं, जैसे दीपक घट पट आदिक पदार्थों का प्रकाशक होता है । अब उसमें कोई हेतु पूछे कि यह दीपक किस कारण से प्रकाश करता है तो भाई वह तो उसका स्वभाव है और अपने स्वभाव में व्यक्त हो रहा है, तो ऐसे ही शास्त्र भी जो पदार्थ जैसे हैं, सत् हैं, जिस तरह हैं, उस तरह बताया करते हैं, और फिर सभो वादी प्रतिवादी अपने यहाँ शास्त्रों को पदार्थ प्रकट करने वाला मानते हैं, फिर यहाँ तो जो कुछ कहा गया है वह अतिशय ज्ञान वाले के द्वारा कहा गया है । मूल में तो सर्वज्ञदेव के द्वारा कहा गया है, फिर उनके उपदेश को ग्रहण कर गणधर आचार्य आदिक के द्वारा कहा गया है । तो जो शास्त्रों में वर्णन है वह ऐसा ही है जैसा कि कहा गया है । जितने भी अन्य प्रवादी हैं उन्होंने अपने अपने सिद्धांत में पदार्थ की व्यवस्था बनायी है । कोई पृथ्वी आदिक द्रव्य को मानते हैं, उनका स्वभाव कहते हैं, कठिन स्वभाव है, जल का द्रव स्वभाव है, अग्नि का उष्णता स्वभाव है, वायु का चलना स्वभाव है, यों वे वस्तु के स्वभाव को प्रकट करते हैं । अब वहाँ कोई कहे कि हेतु बताना चाहिए कि वायु के चलने का स्वभाव क्यों है? जो बात जैसी है उसका वर्णन किया जा रहा है तो ऐसा अन्य सभी सिद्धांतों में पदार्थों के स्वरूप का वर्णन किया है, और फिर जैनशासन में तो सर्वज्ञदेव के द्वारा प्रत्यक्ष जाने गए गणधर आदिक प्रभुवों के द्वारा भी एक देश प्रत्यक्ष देखा गया ही श्रुतज्ञान के द्वारा प्रमाणित किया गया है । इसलिए यह उलाहना देना ठीक नहीं है कि जो सूत्रों में आस्रव के कारण बताये हैं तो उनका नियम नहीं बैठता ।

(106) सूत्रोक्त परिणमनों का नियतकर्मास्रवहेतुत्व बताने का प्रयोजन नियतकर्मानुभागबंध की मुख्यता का प्रतिपादन―अब एक शंकाकार कहता है कि जो कारण बताये गए हैं किसी कर्म के आस्रव के सो उस परिणाम द्वारा तो सभी कर्मों का आस्रव होता है, क्योंकि आयुकर्म को छोड़कर एव कर्मों का आस्रव संसार के सर्वसाधारण जीवों के निरंतर होता रहता है । तो परिणाम चाहे वह प्रदोष का हो, जिसको बतला रहे कि ज्ञानावरण का आस्रव कराता है किंतु उस प्रदोष परिणाम के प्रकट होने पर अन्य कर्मों का भी तो आस्रव होता रहता है । फिर तो जो भी आस्रव बताये गए हैं उनका नियम नहीं ठहर सकता कि अमुक काम करने से अमुक कर्म का आस्रव होता है, क्यों नियम नहीं ठहर सकता कि अनेक कर्मों का आस्रव उस परिणाम से होता है । इस शंका के उत्तर में कहते हैं । यद्यपि यह बात है कि किसी प्रदोष आदिक परिणाम के होने पर अनेक कर्मों का आस्रव होता है याने सूत्र में जिस परिणाम को जिस कर्म के आश्रय का कारण बताया है उसके अलावा अन्य कर्मों का आस्रव होता है, किंतु ऐसा होने पर भी विशेषता के कारण भिन्न-भिन्न कर्मों का नाम दिया गया है । जैसे ज्ञान में प्रदोष करने से यद्यपि प्रदेशबंध सभी का होता है किंतु विशेषतया अनुभागबंध ज्ञानावरण का होता है । इस कारण ज्ञानावरण के आश्रय के कारण में इस ज्ञानप्रदोष को दिया गया है । तो इसी प्रकार जिन-जिन कर्मों के आस्रव के कारण बताये गए हैं उन परिणामों द्वारा उन कर्मों का अनुभाग बंध विशेष होता है और अन्य कर्मों का साधारण होता है । इस विशेषता के कारण यहां आस्रव का नियम बनाया गया है । इस प्रकार इस अध्याय के प्रथम सूत्र में जो बताया था कि काय, वचन, मन के कर्म योग हैं और वे आस्रव के कारण है । सो उस आस्रव के संबंध में जो प्रायोजनिक ज्ञेय तत्त्व था उसका यहां निरूपण किया गया है ।

।। मोक्षशास्त्र प्रवचन एकोनविंश भाग समाप्त ।।


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