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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-8

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आद्यं संरंभसमारंभारक्भयोगकृतकारितानुमतकषाय ।। 6-8।।

विशैषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकश: ।।6-8।।

(30) जीवाधिकरण सांपरायिक आस्रव के प्रकार―आद्य का अधिकरण अर्थात् जीवाधिकरण संरंभ, समारंभ, आरंभ ये तीन मन, वचन, काय ये तीन योग, कृतकारित अनुमोदना ये तीन और क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषाय इनके द्वारा उत्पन्न होते हैं, और इन सबमें एक पाप में एक ही द्वार हो, ऐसा नहीं है । यहाँ 4 बातें कही गई हैं―संरंभ, समारंभ, आरंभ इन तीन में से कोई भी एक हो, मन, वचन, काय इन तीन
योगों में से कोई भी एक हो, करना, कराना, अनुमोदना इन तीन में से कोई एक हो और क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार में से कोई एक हो, ऐसे इस प्रकार एक-एक लेकर चार के समुदाय में आस्रव और पाप होते हैं । जैसे इसमें प्रथम भेद मानिये क्रोधवश होकर मन से संरंभ किया, जिसका अर्थ यह है कि क्रोध कषाय के आवेग में मन से पाप करने का बदलकर विचार स्वयं किया तो यह एक पाप हो गया, ऐसे ही इसको पाप के नाम बनाने से ये सब 108 भेद हो जाते हैं । यों सांपरायिक आस्रव के हेतुभूत पापभाव 108 प्रकार के हैं । इन 108 प्रकार के भावों को टालने के लिए जाप में भी 108 दानों पर स्मरण किया जाता है । एक बार प्रभु का नाम लेकर यह भावना की जाती है कि मेरे ये पाप समाप्त हों ।

(31) सूत्र में आद्य शब्द ग्रहण करने का प्रयोजन व संरंभ समारंभ व आरंभ का भाव―यहां एक शंका होती है कि इस सूत्र में आद्य शब्द ग्रहण न करने से भी काम चल जाता, अपने आप सामर्थ्य से ही सिद्धि हो जाती है । वह सामर्थ्य क्या कि इस सूत्र के बाद जो सूत्र आयेगा उसमें परम् शब्द पड़ा है अर्थात् दूसरे अधिकरण के ये भेद हैं । तो उससे अपने आप ही यह सिद्ध है कि ये पूर्व अधिकरण के भेद हैं अर्थात् जीवाधिकरण के प्रकार हैं । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यदि आद्य शब्द इस सूत्र में न देते तो इसको पढ़कर तुरंत ही कोई स्पष्ट अर्थ न निकलता । एक अनुमान बनाकर अर्थ सोचा जाता तो उसमें जानकारी कठिन हो जाती है । इसलिए स्पष्ट करने के लिए आद्य शब्द दिया है कि यह भेद जीवाधिक रंगरूप है । संरंभ शब्द का अर्थ है हिंसा करने के अभिप्राय रखने वाले का जो प्रयत्न का विचार करता है वह संरंभ है, और समारंभ क्या हुआ? पापके साधनों को जोड़ना समारंभ है और फिर पापमें प्रवृत्ति करना आरंभ है । कोई से भी पाप किए जाते हैं तो प्रथम कुछ विचार होता है, फिर उसके साधन बनाये जाते हैं, फिर पाप किए जाते हैं । तो ऐसा सर्वत्र सांपरायिक आस्रवों के प्रसंगमें ये तीन बातें हुआ करती हैं, भीतर भाव जगना, फिर उसके साधन बनना और फिर उसकी प्रवृत्ति करना । सर्वप्रथम विचार चलता है तो हिंसा आदिक पापों की प्रवृत्तियों में जो प्रयत्न करने का संकल्प बनाया कि मैं इससे मारूँगा, यह चीज उठाऊँगा, मैं उसके साथ राग करूँगा या धन जोडूंगा आदिक रूप से जो अभिप्राय बनता है उस अभिप्राय को संरंभ कहते हैं और जिस कार्य के लिए संरंभ किया उस कार्य के साधनभूत जो पदार्थ हैं उनका अभ्यास करना । जैसे किसी ने यह संकल्प किया संरंभ में कि मैं इसको लाठी से मारूंगा या वध करूँगा तो अब लाठी सीखना, तलवार सीखना, इस प्रकार का अभ्यास बनाना वह समारंभ हो गया अथवा उसके साधनों को इकट्ठा करना समारंभ हो गया । किसी ने परिग्रह की बुद्धि बनाया कि मैं इस प्रकार से यह व्यापार करूंगा, दूकान खोलूंगा तो संकल्प तो संरंभ हुआ, अब उसके साधन जुटाना दूकान बनवाना, किराये पर लेना, उसका मटेरियल जमा करना यह सब समारंभ हो गया, और जिस समय प्रारंभ किया, उस कार्य को शुरू किया तो वह आरंभ हो गया । ये तीनों शब्द संरंभ, समारंभ और आरंभ, ये भाववाचक हैं, इस कारण इनकी उत्पत्ति भावसाधन में होगी । 'संरंभणं संरंभ:, समारंभणं समारंभ:, आरंभनं आरंभ:' इस प्रकार ये वस्तु को बताने वाले तीन भेद हुए ।

(32) काययोग वचनयोग मनोयोग कृतकारित अनुमत का स्वरूप―संरंभादि के पश्चात् योग आता है । योग का विवरण बहुत पहले कर ही दिया गया है । कायकी क्रिया काययोग, वचन की क्रिया वचनयोग, मन की क्रिया मनोयोग अथवा काय की क्रिया के लिए आत्मपरिस्पंद काययोग, वचन की क्रियाके लिए आत्मपरिस्पंद वचनयोग, मन की क्रिया के लिए आत्मप्रदेश परिस्पंद मनोयोग अथवा कार्माणवर्गणावों का आलंबन लेकर आत्मप्रदेश परिस्पंद होना काययोग । वचन वर्गणावों का आलंबन लेकर आत्मप्रदेश परिस्पंद होना वचनयोग, कायवर्गणावों का आलंबन लेकर आत्मप्रदेश परिस्पंद होना काययोग । योग में मुख्यता आत्मप्रदेश परिस्पंद की है और काय आदिक के भेद से भेद करना यह औपचारिक भेद है । योग के बाद सूत्र में आया है कृतकारित अनुमत । स्वतंत्रतया आत्मा के द्वारा जो किया गया वह कृत कहलाता है । किसी भी कृत पाप में दूसरे की अपेक्षा नहीं की गई, किंतु यह स्वयं ही उस पाप को विचारता है, साधन जोड़ता है और प्रारंभ करता है । कारित पाप में दूसरे के प्रयोग की अपेक्षा है । कारित कहते हैं कराये हुए को तो कराया हुआ तब ही कहलाता जब दूसरे के आदेश या प्रयोग की अपेक्षा करके सिद्धि होती है किसी कार्य की तब उसे कारित कहते हैं । अनुमत का अर्थ है प्रयोजक पुरुष के मानसिक परिणाम करना । जैसे कोई मौनव्रती है, आँखो से देखने वाला है, उस कार्य को देख रहा है और प्रसंग भी ऐसा है कि उस कार्य का निषेध किया जाना उचित है, पर वह निषेध नहीं करता और उसको ठीक मान रहा तो वहां अनुमत नाम का पाप लगेगा । ऐसी अनुमोदना करने वाले को अनुमंता कहते हैं । तो एक अनुमंता तो वह हुआ जो चुपचाप उसका अनुमोदन कर रहा । एक दूसरा अनुमंता कराने वाला भी होता है । जब कराने वाले ने उसका प्रयोग करवाया तो उस कार्यमें समर्थ आचरण में उसका मन लगा ना तो वह भी अनुमंता कहलाया । तो अनुमत पाप उसे कहते हैं कि कोई करे या कराये, किसी प्रकार कार्य हुआ हो, कार्य के प्रति अनुमोदना करना।

(33) कषाय, विशेष व क्रियोपस्कार का कथन―कृतादि के बाद सूत्र में कषाय का नंबर आता है । कषायों का लक्षण अनेक बार कहा ही गया है कि जो आत्मा को कसे, कष्ट दे वे कषायें कहलाती हैं । वे कषायें क्रोध, मान, माया, लोभ हैं और उनमें भी सम्यक्त्व घातक कषाय, अणुव्रतघातक कषाय, महाव्रतघातक कषाय और यथाख्यातसंयमघातक कषाय, उनके चार प्रकार होते हैं, पर इस प्रथम सूत्र में उन सबका संग्रहरूप केवल क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार नाम ही विवक्षित हैं । यहाँ प्रथमपद के अंत में विशेष शब्द दिया है जिसका अर्थ होता है कि कोई बात किसी अन्य बात से जुदा हो उसे विशेष कहते हैं अथवा विशेष बनना सो विशेष है और इस विशेष का प्रत्येक शब्द के साथ जुड़ना होता है । जैसे संरंभविशेष, समारंभविशेष, आरंभविशेष, कृतविशेष आदिक सभी में विशेष शब्द लगाया जाता है । यहाँ शंकाकार कहता है कि सूत्र में विशेष शब्द ठीक नहीं संगत हुआ, क्योंकि करण कारक का प्रयोग वहां होता है जहां क्रियापद का प्रयोग हो । यहां कोई क्रिया ही नहीं है फिर विशेष ही यह प्रयोग नहीं बन सकता । क्रियापद के प्रयोग बिना कर्ता, कर्म, करण आदि कारक कैसे बन सकते हैं? अत: सूत्रमें विशेषै: यह शब्द न देना चाहिए । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि यह शब्द वाक्य शेष की अपेक्षा रखता है, यहाँ पर क्रियापद आशय से समझ लिया जाता है अर्थात् संरंभ आदिक विशेषों के द्वारा आस्रव भेदा जाता है । अर्थात् आस्रवके भेद बनते हैं, जहां क्रियापद का प्रयोग न किया गया हो वहाँ उसकी अपेक्षा रखकर कारक की विवक्षा देखी गई है । जैसे किसी ने कहा―शंकुलाखंड । शंकुला कहते हैं सरौता को और खंड कहते हैं टुकड़ा को तो यहाँ कोई क्रिया का प्रयोग नहीं किया गया, पर अपने आप यह अर्थ ध्वनित हो जाता है कि सरौता के द्वारा किया गया खंड । तो जिस क्रिया का कहीं नाम न दिया हो उसका उपस्कार कर लिया जाता है अर्थात उस क्रिया की यहां सजावट कर ली जाती है । यहां भेद का अधिकार तो चल ही रहा है । जैसे 5 वें सूत्र में आया था कि ये पूर्व के भेद हैं अर्थात् सांपरायिक आस्रव के भेद हैं सो उसी भेद की ही बात चल रही है । तो यहाँ भी यह अर्थ बन जायेगा कि सरंभ आदिक विशेषों
के द्वारा सांपरायिक आस्रव के भेद होते हैं ।

(34) संख्यायें, संख्याक्रम, संरंभादि प्रथम कथन कारण का वर्णन―सूत्र में दूसरा पद है संख्यावों के समास वाला । ये चार बार संख्यायें आयी है―3, 3, 3, 4 इनका क्रम से संपर्क बनाया जाता है कि संरंभ, समारंभ आरंभ ये 3, योग 3 कृतकारित अनुमत 3 और कषायें 4, यहाँ एकश: शब्द जो दिया गया है उसका भाव यह है कि प्रत्येक में एक-एक संख्या का संबंध बनाना । अब यहाँ यह बात जानने योग्य है कि इन सबमें पहले संरंभ आदिक तीन क्यों कहे गए हैं । इन तीन का सर्वप्रथम कहने का कारण यह है कि यह वस्तुरूप है, कार्यरूप है, जब कि अन्य कृत आदिक विशेषण अथवा करणरूप हैं । और ये जो तीन प्रकार के पाप हैं संरंभ, समारंभ और आरंभ, वे किस-किस प्रकार से होते है, उनके भेदने के कारणभूत बाकी योग आदिक हैं । तो वस्तु होने से विशेष्य होने से सर्वप्रथम संरंभ समारंभ और आरंभ, इन तीन शब्दों का प्रयोग किया गया है ।

(35) एक सौ आठ पापों के नाम बनाने की विधि―पाप के नाम बनाने के लिए प्रतिलोम विधि से एक एक नाम लेकर 4 के नाम का एक पाप का नाम बनता है । जैसे अंत में कहा गया है कषाय । तो एक कषाय का नाम रखिये उससे पूर्व कहा गया है कृतकारित अनुमत, इनमें से एक रखिये उससे पूर्व कहा है योग । उन तीन योगों में से एक नाम रखिये फिर संरंभ, समारंभ, आरंभ में एक शब्द रखिये तो वह एक पाप का नाम हो जायेगा । जैसे [1] क्रोध―कृतकायसंरंभ फिर इसके बाद दूसरे नंबर के पाप का नाम लेने के लिए उस आखिरी की ही बदल करिये । [2] मानकृतकाय संरंभ, फिर [3] तीसरा मायाकृतकायसंरंभ, फिर [4] चौथा―लोभकृतकाय संरंभ । चारों कषायों के आधार पर और सबके पृथक्-पृथक् भेद के साथ नाम बन जाने पर अब कषाय से पहले कहे गए कृतादि भेद को बदलना होगा । (5) पांचवां बना क्रोधकारितकायसंरंभ । [6] मानकारितकाय संरंभ [7] मायाकारितकायसंरंभ [8] लोभकारितकायसंरंभ । यों कारित की अपेक्षा 4 भेद और हो जाने से 9 वाँ भेद बनाने के लिए कृतकारित अनुमत में से फिर आगे बढ़ते हैं, तो बदलकर अनुमत शब्द रखा जिससे 4 भेद बने [9] क्रोधानुमतकायसंरंभ, [10] मानानुमतकायसंरंभ, जिसका सीधा अर्थ हुआ कि मान के द्वारा अनुमोदना किया गया काय के पापका विचार [11] ग्यारहवां हुआ मायानुमतकायसंरंभ और [12] बारहवां हुआ लोभानुमतकायसंरंभ । जब इस प्रकार संरंभ पापविषयक 12 भेद हो चुके तब समारंभ के भी इसी प्रकार 12 भेद होंगे । अर्थात् जैसे ये भेद कहे गये हैं, उनके अंत में संरंभ शब्द आया है तो संरंभ के एवज में समारंभ शब्द आयेगा । समारंभ भी 12 होते हैं । तब आरंभ के भी ऐसे ही 12 भेद करना । तो आखिरी समारंभ के एवज में आरंभ शब्द देना, इस प्रकार काय संबंधी पाप 36 प्रकार के होते हैं । ऐसे ही वचन संबंधी पाप 36 प्रकार के हैं और मन संबंधी पाप भी 36 प्रकार के हैं । यों ये सांपरायिक आस्रव के जीवाधिकरण 108 प्रकार के होते हैं अर्थात् जीव का ही आलंबन लेकर अपने आपके मन, वचन, काय के प्रयोग का आलंबन लेकर ये 108 पाप होते हैं ।

(36) सूत्रोक्त च शब्द से क्रोधादि के अन्य विशेषों का संग्रह―इस सूत्र में जो च शब्द दिया है उसके देने की आवश्यकता तो न थी, फिर भी दिया है । तो वह निरर्थक होकर एक रहस्य को प्रकट करता है कि कषायें यहां पर 4 कही गई हैं तो उन 4 के भी भेद अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन होते हैं । इस प्रकार 4 का और गुणा करने से ये सब 432 प्रकार के जीवाधिकरण आस्रव हों जाते हैं । और जो अंनंताधुबंधी आदिक लगाये गए सो उनके साथ संबंध होने से इन सभी में जीवाधिकरणपना सिद्ध होता है।
जैसे कि नील रंग में डाला हुआ कपड़ा उस नील से रंग जाने के कारण वह भी नीला ही कहलाता है ऐसे ही संरंभादिक जितनी भी क्रियायें हैं उन क्रियावों में अनंतानुबंधी आदिक कषायों का संबंध होने के कारण वे भी जीवाधिकरण कहलाती हैं । इस प्रकार जीवाधिकरण के 432 भेद बताये गए हैं । अब जगत में जितने भी पाप होते हैं किसी भी जीव के द्वारा पाप बनते हैं तो वे पाप इन 432 में से किसी नाम वाला पाप होता है ।

(37) साधुजनों की निष्पापता―ये पाप जिसके नहीं होते हैं वे साधु कहलाते हैं या कहो कि 108 प्रकार के पापों का त्याग होने से ही साधुवों के सम्मान में 108 श्री लगाकर बोलते हैं । जैसे कहते हैं श्री 108 अमुक मुनि महाराज, तो उसका अर्थ है कि श्री एक बार न कहकर श्री-श्री ऐसा 108 बार बोलना चाहिए, फिर उसके बाद मुनि महाराज का नाम लेना चाहिए, पर ऐसा 108 बार श्री गिनेगा कौन और इतना कहेगा कौन, और कदाचित् कोई इतना कहकर नाम ले तो उसे तो लोग बड़े आश्चर्य के साथ देखेगे कि इसके दिमाग में क्या हो
ही गया? तो उसका एक संकेत है श्री 108 कहना । साधु महाराज के ये कोई पाप नहीं होते । जो वास्तविक मुनि है वह किसी भी प्रकार के पाप का विचार नहीं करता, न उसके साधन जोड़ेगा । जब आशय ही नहीं किसी भी पाप का तो साधन जोड़ना और उसका प्रारंभ करना यह तो हो ही कैसे सकेगा? इस प्रकार न वह पापकर्म करता है, न पाप की अनुमोदना करता है, और इन पापों के लिए उसके मन, वचन, काय की वृत्ति भी नहीं होती । उसके कषायें भी नहीं जगती । यद्यपि क्रोध, मान, माया, लोभ संज्वलन विषयक साधुवों के पाये आते हैं और इस दृष्टि से देखा जाये तो कुछ पाप तो हो ही रहा है, मगर रूढ़ि में, देखने में, अनुभवने में जिन पापों की बात आती है उन पापों की अपेक्षा यह बात कही जा रही है अथवा उनके जो भी क्रोध, मान, माया, लोभादिक कषायें रह गई हैं तो उनका रूप बदला हुआ रहता है । कोई आचरण बिगड़ जाये तो उसके लिए क्रोध होगा । अपने आपकी ज्ञानगरिमा को रखने के लिए अर्थात् ज्ञान स्वरूप से अपना महत्त्व समझने विषयक मान होगा । कोई विहार आदिक का कार्य करना पड़े और आशय नहीं है या दीक्षा शिक्षा आदिक कृत्य करना पड़ता, उपदेश आदिक करना पड़ता और उसका चाव नहीं है, क्योंकि वे सब परालंबी बातें है तो इस प्रकार की माया का प्रयोग समझ लीजिए । उनको लोभ होता है अपना आचरण पवित्र रखने का, परिणाम निर्मल रखने का और अपनी योग्य क्रियावों से च्युत न होने का । यों साधु निष्पाप होते है । अब जीवाधिकरण के भेद बतानेके बाद जीवाधिकरण से विपरीत जो अजीवाधिकरण है उसके भेद बताने के लिए सूत्र कहते हैं ।


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