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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-9

From जैनकोष



निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदा: परम् ।। 6-9 ।।

(38) अजीवाधिकरण आस्रवके भेद―निर्वर्तना, निक्षेप, संयोग और निसर्ग ये क्रमश: दो चार, दो, तीन भेद वाले हैं और ये सब अजीवाधिकरण हैं । निर्वर्तना का अर्थ है रचना । यह शब्द कर्मसाधन में लगाना है । जो रचा जाये सो निर्वर्तना निर्वर्त्यते इति निर्वर्तना, इसी प्रकार निक्षेप भी कर्मसाधन में है, निक्षेप का अर्थ है रखना, जो रखा जाये सो निक्षेप 'निक्षिप्यते इति निक्षेप:' संयोग का अर्थ है मिलाना, यह भी कर्मसाधन में है । 'संयुज्यते असौ संयोग:' जो मिलाया जाये सो संयोग । निसर्ग का अर्थ है प्रवृत्ति' यह भी कर्मसाधन में है । 'निसृज्यते असौ निसर्ग:,' अथवा इन चारों शब्दों का भाव साधन में भी अर्थ किया जा सकता है । रचना सो निर्वतना, निर्वर्तन निर्वतना, रखना सो निक्षेप, निक्षेपणं निक्षेप:, मिलना सो संयोग संयुक्ति संयोग:, प्रवर्तन करना सो निसर्ग, निसृष्टि: निसर्ग: यहाँ अधिकरण शब्द की अनुवृत्ति आती है अर्थात् पूर्व सूत्र में जहां कि अधिकरण के भेद किए गए थे उस 7 वें सूत्र में जो अधिकरण शब्द प्रयोग किया गया है उसकी अनुवृत्ति 8 वें सूत्र में भी थी और इस 9 वें सूत्र में भी करना, तब अर्थ हुआ कि ये सब अजीवाधिकरण आस्रव हैं, अर्थात् इन अजीव पदार्थों के आलंबन से, इनके विचार से कर्म का आस्रव होता है ।

(39) अजीवाधिकरण आस्रव के भेदों का स्वरूप―इस सूत्र में 3 पद हैं । प्रथम पद में तो चार संज्ञायें हैं और उनका समास किया गया है, दूसरे पद में संख्या शब्दों का कथन है और ये संख्यायें उनमें क्रम से लगती है अर्थात् निर्वर्तना के दो भेद है, निक्षेप के चार भेद हैं, संयोग के दो भेद हैं और निसर्ग के 3 भेद हैं । निर्वर्तना रचना को कहते हैं । यह मूल रचना और उत्तर रचना के भेद से दो प्रकार है । जीव के साथ संबद्ध जो औदारिक आदिक 5 शरीर हैं और वचन, मन, श्वासोच्छ्वास हैं, इनका जो निष्पादन है बनता रहना है, इसका जो बनना है वह मूलनिर्वर्तना है । इसके सहारे जीव के परिणाम होते है और उनसे कर्म का आस्रव होता है । जो असंबद्ध है प्रकट बाह्य क्षेत्र में है ऐसी चीजों का निष्पादन करना उत्तरगुण निर्वर्तना है । जैसे कोई काठ की चीज बनाता, चित्र बनाता, तलवार, छुरी आदिक बनाता या धार्मिक ग्रंथ पर धार्मिक पुरुषों के चित्र बनाता, यह सब उत्तरगुण निर्वर्तना है । इससे भी कर्मों का आस्रव होना है । शुभ हों अथवा अशुभ हों । निक्षेप 4 प्रकार के हैं । निक्षेप का अर्थ है रखना । बिना देखे हुए जमीन पर चीज का रख देना यह निक्षेप का प्रथम भेद है । इसका नाम है अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण, दूसरा निक्षेप का भेद है दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरण अर्थात् बड़े बुरे भाव से, जोर से चीज का रख देना । जैसे कभी गुस्सा आता हो तो लोटा, थाली आदिक कुछ भी बड़े जोर से रखे जाते हैं तो बुरे भाव से हींसकर, दुःखी होकर रखना सो यह दूसरा निक्षेप है । तीसरे निक्षेप का नाम है सहसानिक्षेपाधिकरण । जल्दी ही किस चीज को धर देना, धरने में जल्दबाजी कारना, जल्दबाजी से कोई चीज रखने में हिंसा संभव है और उससे कर्म का आस्रव होता है । चौथा निक्षेप है अनाभोग निक्षेपाधिकरण अर्थात् किसी चीज को एक ओर से रखना, पूरी ही न रखना या बिना विचारे यत्र तत्र रखना यह चौथा निक्षेप है । इन प्रवृत्तियों से कर्मों का आस्रव होता है । संयोगाधिकरण दो प्रकार का है―(1) भोजनपान संयोग, (2) उपकरण संयोग । भोजनपान में अन्य भोजनपान का संयोग कर देना, ठंडे में गर्म मिला देना, गर्म में ठंडा रख देना यह सब प्रथम संयोग हैं । दूसरा संयोगाधिकरण है उपकरणसंयोगाधिकरण । जिस वस्तु पर जो-जो वस्तु प्राय: नहीं रख देना या गरम वस्तु पर ठंडी वस्तु रखी जाती उसको रख देना याने अनमेल एक पदार्थ में दूसरा पदार्थ रखना यह उपकरणसंयोगाधिकरण है । जैसे धार्मिक ग्रंथ पर कोई चश्मा आदिक चीज न रखना चाहिए, उससे विनय में अंतर होता है । पर रख दिया यह उपकरण संयोग है या शास्त्र के बीच कोई सींक रख देना ख्याल के लिए कि यहां तक पढ़ लिया । जो वस्तु जहाँ न रखी जानी चाहिए उसको वहां संयोग कराना यह उपकरण संयोग है । निसर्ग आस्रव तीन प्रकार के हैं । शरीर से प्रवृत्ति करना, वचन से प्रवृत्ति करना और मन से प्रवृत्ति करना, इस तरह ये अजीवाधिकरण के भेद कहे गए हैं ।

(40) सूत्र में पर शब्द के ग्रहण की निरर्थकता की शंका―यहाँ एक शंकाकार कहता है कि सूत्र में पर शब्द का प्रयोग न करना चाहिए, क्योंकि इससे पहले सूत्र में आद्य शब्द आ चुका है कि वे प्रथम अधिकरण के भेद हैं । तो यहां अपने आप सिद्ध हो जायेगा कि ये दूसरे अधिकरण के अर्थात् अजीवाधिकरण के भेद है अथवा यदि इस सूत्र में पर शब्द रखना है तो पहले सूत्र में आद्य शब्द न कहना चाहिए, क्योंकि यह एक के कहने पर दूसरे की बात अपने आप सिद्ध हो जाती है । जैसे कोई यह कहे कि मेघ न होने पर वृष्टि नहीं होती तो अपने
आप यह बात सिद्ध हो गई कि मेघ के होने पर वृष्टि होती है । यहां कोई यह शंका न करे कि मेघों के होने पर वृष्टि होती भी है नहीं भी होती है, तो उसका उत्तर यह है कि वहां ऐसा नियम नहीं बनाया जा रहा । जब यह कहा कि मेघ के न होने पर वृष्टि नहीं होती तो उसका अर्थ यह निकला कि मेघ के होने पर ही वृष्टि होती है । जैसे कोई कहे कि अहिंसाधर्म है तो दूसरी बात अपने आप सिद्ध ही हो जाती कि हिंसा अधर्म है । तो ऐसे ही यदि आद्य शब्द दिया है पहले सूत्र में तो इस सूत्रमें पर शब्द न कहना चाहिए । यदि इस सूत्र में 'पर' शब्द दिया जाता है तो प्रथम सूत्र में आद्य शब्द न कहना चाहिए । यदि कोई ऐसा उत्तर देने की कोशिश करे कि पर शब्द न देनेसे संबंध ठीक नहीं बनता, न जाने किससे संबंध बन जाये तो उसका उत्तर यह है कि अन्य किसी का अर्थ से संबंध बने ऐसा कोई है ही नहीं । प्रकरण दोनों का चल रहा है जीवाधिकरण और अजीवाधिकरण का । यहां यह संदेह न होगा कि कहीं जीवाधिकरण न मान लिया जाये । उसका तो वर्णन इससे पहले सूत्र में हो चुका है, वह जीवाधिकरण है । तो बचे हुए के न्याय से अपने आप अजीवाधिकरण है यहां यह सिद्ध हो जाता है इस कारण इस सूत्र में पर शब्द कहना अनर्थक है । कोई ऐसी भी आकांक्षा न करे कि यहां पर शब्दका अर्थ प्रकृष्ट मान लेंगे तो क्या यह अजीवाधिकरण प्रकृष्ट हो गया और जीवाधिकरण निकृष्ट हुआ जिससे प्रकृष्ट अजीवाधिकरण माना जाये । यों जीवाधिकरण रद्दी हुआ, अजीवाधिकरण उत्कृष्ट हुआ ऐसा कुछ नहीं है । कोई ऐसी भी आशंका न रखे कि पर शब्द का अर्थ इष्ट मान लेंगे । जैसे कहा कि यह परमधाम को गया मायने इष्टधाम गया, ऐसा इष्ट अर्थ मानना क्यों ठीक नहीं है कि ऐसा मानने पर वह अनिष्ट क्या है जिसके होने पर यह पर शब्द इष्ट है? कोई निर्वर्त्य नहीं, कुछ भी नहीं, तब पर शब्द का प्रयोग करना अनर्थक है ऐसी यह एक आशंका होती है ।

(41) सूत्र में पर शब्द के ग्रहण की निरर्थकता की आशंका का समाधान―अब उक्त आशंका का समाधान करते हैं । सूत्र में जो पर शब्द दिया है और वह अनर्थक नहीं है, क्योंकि इस सूत्र में पर शब्द से कुछ रहस्यपूर्ण अन्य अर्थ निकलता । और वह अर्थ यह निकलता कि ये निर्वर्तना आदिक पूर्वोक्त संरंभ आदिक से भिन्न हैं । यदि ऐसा ध्वनित न होवे तो जैसे संरंभ आदिक जीवके परिणाम हैं और वे जीवाधिकरण माने गए हैं ऐसे ही निर्वर्तना आदिक भी जीव के परिणाम मान लिए जायेंगे और ये जीवाधिकरण कहलायेंगे, इस कारण सूत्र में पर शब्द को ग्रहण किया गया है अथवा सब स्पष्ट करने के लिए पर शब्द ग्रहण किया गया है अथवा इस 'पर' शब्द के द्वारा इष्ट अर्थ भी जाना जा, सकता है, वह इष्ट अर्थ वह है जो, कि निर्वर्तना आदिक के भेदों के विवरण में ध्वनित किया गया है । अब यहां एक जिज्ञासा होती है कि इस आस्रव के प्रकरण में मन, वचन, काय के परिणाम बताये गए । ये योग हैं और ये आस्रव कहलाते हैं, और इन तीनों योगों के परिणमन अनंत ढंग के हैं, पर एक आस्रव का एक वचन में प्रयोग होने से क्या यह सिद्ध होता है कि सभी कर्मों का आस्रव एक रूप से होता है । उसका उत्तर संक्षेप में यह है कि एक ढंग से सर्व प्रकार के आस्रव नहीं होते । कोई किसी का किसी कारण से काय आदिक का व्यापार जैसे होता है उस प्रकार के आस्रव होते हैं । तो उनमें सर्वप्रथम ज्ञानावरण और दर्शनावरण के आस्रव की बात कहते हैं ।


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