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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-10

From जैनकोष



दुःखमेव वा ।। 7―10 ।।

(133) हिंसादि समस्त पापों की दुःखकारणता व दु:खरूपता―हिंसा आदिक पापों के संबंध में यह भावना और ध्यान रखनी चाहिये कि हिंसा आदिक पाप दुःखस्वरूप हैं । यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुःख तो असातावेदनीय के उदय से होने वाला संताप परिणाम है और हिंसा आदिक क्रिया विशेष है, उनको दुःख ही कैसे कह दिया गया? दुःख करने वाला है, दुःख के कारण हैं, इन शब्दों से कहते तब तो उचित था पर यह स्वयं दुःख ही है, यह कैसे कहा गया है? इस शंका के उत्तर में कहते है कि यहाँ कारण में कार्य का उपचार करके सुगम बोध के लिए इस प्रकार कहा गया है । जैसे लोक में कहते हैं कि अन्न ही प्राण है तो प्राण तो जुदी चीज है, अन्न जुदी चीज है, किंतु यदि अन्न न खाया, भोजन त्याग कर दे या न मिले तो ये प्राण नहीं टिक सकते । तो प्राण टिकने के कारणभूत हैं अन्नादिक सेवन, तो प्राण के कारणभूत अन्न में प्राण का जैसे उपचार किया जाता है इसी प्रकार दुःख के कारणभूत हिंसा आदिक में ये पाप दुःख ही हैं, इस प्रकार का उपचार किया गया समझना, अथवा कभी-कभी तो कारण के कारण में भी कार्य का उपचार होता है । जैसे प्राण का कारण तो अन्नपान है और भी भोजनादिक अन्न आदिक कैसे लाये जाये तो उसका उपाय है पैसा । तो कभी ऐसा भी कहा जाता कि यह पैसा ही प्राण है, तब ही तो कोई पुरुष धन हर ले तो कहा करते है कि वह उसका प्राण हरता है । तो तीसरी बात यह है कि हिंसा आदिक पाप असातावेदनीय कर्मबंध का कारणभूत है और असातावेदनीय कर्म दु:ख का कारणभूत हैं । तो दुःख के कारण के कारण का दुःख का उपचार किया गया है । दुःख के कारण हैं असातावेदनीय कर्मविपाक और असातावेदनीय के बंध का कारण है हिंसा आदिक पाप, ये दुःख ही हैं, ऐसा उपचार किया गया है ।

(134) पापविरक्त संतों का चिंतन―पापों से विरक्त रहने वाले जनों का ऐसा चिंतन होता है कि जैसे बधपीड़ा मेरे को अप्रिय है उसी प्रकार सर्व प्राणियों को बधपीड़ा अप्रिय होती है । जैसे उसके विषय में कोई मिथ्या बात कही, कटुक वचन बोला तो उनको सुनकर जैसे मेरे को अत्यंत तीव्र दुःख होता है ऐसे ही खोटे वचनों से सर्व जीवों को दुःख पहुंचता है और जैसे मेरे इष्ट द्रव्य का वियोग हो जाये, कोई मेरी चीज चुरा ले जाये तो बड़ी तकलीफ होती है इसी प्रकार दूसरों का द्रव्य हरा जाने से उन्हें अत्यंत कष्ट होता है । और जैसे मेरे स्त्रीजनों का तिरस्कार होने पर तीव्र मानसिक पीड़ा होती है उसी प्रकार अन्य जनों को भी इस कुशील के प्रसंग में पीड़ा होती है और जैसे मेरा परिग्रह नष्ट हो जाये या प्रयत्न करने पर भी प्राप्त न हो तो उसकी इच्छा रखने से और शोक से दुःख उत्पन्न होता है इसी प्रकार सर्व प्राणियों को दुःख होता है । ऐसी भावना करके अपने समान दूसरों का दुःख विचारकर हिंसा आदिक पापों से विरक्त रहना ही चाहिए ।

(135) वैषयिक सुखों की दुःखरूपता―यहां शंकाकार कहता है कि हिंसा आदिक पापों को दुःख रूप ही बताया जा रहा है, सो यह एकांत से कहना ठीक नहीं लग रहा, क्योंकि मैथुन प्रसंग में अर्थात् अबह्मचर्य नामक पाप में स्पर्शकृत सुख पाया जाता है । जैसे किसी श्रेष्ठ स्त्री के कोमल शरीर के संस्पर्श से रति का सुख होता है तब हिंसादिक दुःख ही है, यह बात तो न बनी । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि अब्रह्मचर्य में सुख रूप वृत्ति नहीं है किंतु वह तो वेदना का इलाज है । जैसे दाद खाज हो जाने पर उस दाद खाज से पीड़ित हुआ पुरुष नख से पथरी आदिक से अपना शरीर खुजाता है और उस समय खून से गीला हो जाता है तो उस समय दाद खाज मिट तो नहीं रहा, उस समय दुःख भी होता है लेकिन यह खुजैला उसमें सुख मानता है । इस प्रकार मैथुन को भोगने वाला मोही प्राणी अपने अज्ञान से दु:खरूप वृत्ति को भी सुख ही मानता अथवा है उसकी कल्पना से भले ही उस समय सुख माना जा रहा हो, पर वह दुःख का कारण है । इस कारण वह अब्रह्म दुःख ही है, ऐसी भावना रखनी चाहिए । अब बताते हैं कि जैसे ये क्रिया विशेष जो 5-5 भावनायें कही गईं वे वृत्तियां यदि शुद्ध लक्ष्य से भाई जाये तो व्रत की पूर्णता को करती हैं, उसी प्रकार अगले सूत्र में कही जाने वाली भावनायें इस लोक और परलोक के लौकिक प्रयोजन के बिना भायी जाये तो ये भी व्रत की समृद्धि को करते हैं । तो वे कौनसी भावनायें हैं उसके लिए सूत्र कहते है ।


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