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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-11

From जैनकोष



मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमानाविनेयेषु ।। 7-11 ।।

(136) मैत्री प्रमोद कारुण्य व माध्यस्थयभावना का व्रत की परिपूर्णता में सहयोग―सर्व जीवों में मैत्री भाव होना, अपने से गुणाधिक पुरुषों में प्रमोदभाव होना, दुःखी जीवों में करुणा भाव होना और अविनेय, उद्दंड पुरुषों में मध्यस्थभाव होना यह भावना व्रत संपत्ति को समृद्ध करती है । मैत्री का अर्थ है अपने शरीर, मन वचन के द्वारा करने, कराने, अनुमोदने के द्वारा दूसरों के दुःख की अनुत्पत्ति की अभिलाषा होना, स्नेह का भाव होना सो मंत्री भावना है । किसी भी जीव को दुःख उत्पन्न न हो ऐसी भावना को मैत्री कहते हैं । मैत्री भावना वाला जीव न दुःख की उत्पत्ति का उपाय करता है, न कराता है, न करते हुए को अनुमोदता है । मन, वचन, काय से गुणित कृतकारित अनुमोदना, इस प्रकार नवकोटि से सभी जीवों के दुःख की अनुत्पत्ति विचारना सो मैत्री भावना है । प्रमोद भावना―अपने मुख की प्रसन्नता द्वारा नेत्रों के हर्षण द्वारा शरीर में रोमांच होना, इस प्रकार की प्रवृत्ति से और स्तुति करना, निरंतर नाम लेना, गुण बखानना आदिक प्रवृत्तियों से जो भक्ति प्रकट की जाती है उसका नाम प्रमोद है । प्रमोद शब्द में प्र और मोद ऐसे दो शब्दों का समास है । प्रकर्ष रूप से हर्ष होना, जो रत्नत्रयधारी हैं, ज्ञान में बड़े हैं, शांति क्षमा में बड़े हैं, ऐसे पुरुषों को देखकर ऐसा अंतरंग में हर्ष होना कि जिससे मुख पर प्रसन्नता भी स्वयं बनती है, रोमांच हो जाता है, ऐसी भीतरी भक्ति को प्रमोदभावना कहते हैं । कारुण्यभावना―जो जीव दुःखी हैं, दीन हैं, शारीरिक मानसिक दु:ख से पीड़ित हैं, ऐसे दीन पुरुषों का अनुग्रहरूप परिणाम होना सो कारुण्य है । कारुण्य शब्द करुण से बना है । करुणस्य भाव कारुण्यं । करुण कहते हैं कोमल पुरुष को, दयाशील हृदय वाले पुरुष को । उसके परिणाम का नाम कारुण्य है । माध्यस्थ का अर्थ । है मध्य में रहना अर्थात् रागद्वेष पूर्वक पक्षपात न होना । किसी के पक्ष में कोई पड़ा है राग से या द्वेष से याने किसी से प्रीति विशेष है तो वह उसके पक्ष में आ जाता है और किसी से द्वेष बनता है तो उससे भी जो द्वेष रखता हो उसके पक्ष में आ जाता है । तो किसी के पक्ष में पड़ने का नाम पक्षपात है । जहाँ पक्षपात नहीं होता वहाँ वह बीच में ठहरा है यों कहा जाता है । मध्ये तिष्ठति इति मध्यस्थ: तस्य भाव: माध्यस्थयं । रागद्वेष न करके उपेक्षाभाव से रहना माध्यस्थ्यभाव है ।

(137) भावनावों के आश्रय व आलंबनों का दिग्दर्शन―ये चार भावना में किन के प्रति की जानी चाहिएँ इसका उत्तर इस सूत्र के तृतीयपद में है । सत्त्व, गुणाधिक, क्लिश्यमान और अविनेय । सत्त्व का अर्थ है चारों गतियों के संसारी प्राणी । सत्त्व शब्द सिद्ध धातु से बना है जिसका अर्थ दुःख पाना है । अनादि परंपरा से चले आये हुए 8 प्रकार के कर्मों की बंध संतति से जो तीव्र दुःख वाली योनियों में, चारों गतियों में दुःख पाते हैं उन्हें सत्त्व कहते है । सत्त्व का अर्थ हुआ संसार के दीन दुःखी सभी प्राणी―उनमें मैत्री भावना की जाती है । गुणाधिक का अर्थ है जो गुणों में अधिक हो । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, सम्यक्त्व आदिक गुण हैं । यहाँ गुण के मायने द्रव्य, गुण पर्याय में कहा हुआ गुण नहीं, शक्ति नहीं । किंतु जो सदाचार श्रद्धा ज्ञान आदि भली भांति है वे गुण हैं, उन गुणों से जो बड़े चढ़े हुए हैं उन पुरुषों को गुणाधिक कहते हैं, गुणाधिक पुरुषों में प्रमोदभाव करना व्रत की निर्दोषता में साधक है । क्लिश्यमान अर्थात् दुःखी, असातावेदनीय के उदय से जिन्हें शारीरिक मानसिक दुःख प्राप्त हुए हैं और उस दुःख के संताप से जो कष्ट पा रहे हैं उन्हें क्लिश्यमान कहते है । क्लिश्यमान जीवों में कारुण्यभावना कही गई है अविनेय―जो विनेय नहीं हैं, सुपात्र नहीं हैं उन्हें अविनेय कहते हैं । तत्वार्थ के उपदेशों का सुनना और उन उपदेशों को ग्रहण करना―इन दो वृत्तियों के द्वारा जो पात्ररूप किया जाता है, विनीत किया जाता है उन्हें विनेय कहते हैं । जो विनेय नहीं हैं उन्हें अविनेय कहते हैं । अविनेय का अर्थ है दुराचारी, उद्दंड, दुष्ट, प्रकृति वाला, ऐसे पुरुषों में मध्यस्थभाव करना बताया है ।

(138) चारों भावनावों में चिंतन की मुद्रा की रेखा―मैत्री भावना में ऐसा चिंतन चलता है कि मैं सर्व जीवों को दुःखी करता हूँ, सर्व जीवों से क्षमा चाहता हूँ, मेरी प्रीति सर्व प्राणियों के साथ है । किसी के भी साथ मेरा बैर मत हो । इस तरह का चिंतन स्व और अन्य जीवों के स्वरूप का लक्ष्य करके ज्ञानियों के हुआ करता है । इस प्रकार की मैत्री सर्व प्राणियों में मानना चाहिए । दूसरी भावना―जो सम्यग्ज्ञान से अधिक है, निर्दोष सम्यक्त्वपालन है, जिनका उपयोग स्वच्छ है, रागद्वेष वृत्ति से रहित समतापरिणाम वाले हैं ऐसे पुरुषों के प्रति वंदना करना, स्तुति करना, उनकी सेवा करना आदिक प्रवृत्तियों से प्रमोदभाव बनाना चाहिए । जो पुरुष कष्ट पा रहे हैं, मोह से दबे हुए हैं, कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान से घिरे हुए हैं और विषयों की तृष्णा की अग्नि से जिनका मन चलित हो रहा है, जिनकी प्रवृत्ति विपरीत हो रही, हित कार्यों से हटे हुए हैं, अहित कार्यों में जुटे हुए हैं, नाना प्रकार के दुःखों से घिरे हुए हैं, ऐसे दीन पुरुषों में, कृपण पुरुषों में, अनाथ में, बालक में, वृद्ध में अनुकंपाभाव जगना―ऐसी करुणा की भावना होनी चाहिए । जो पुरुष ऐसे अपात्र हैं कि जो उपदेश ग्रहण कर नहीं सकते, भली बात को हृदय में धार नहीं सकते, ज्ञान की बात सुनना भी पसंद नहीं करते, जिनमें सही तर्क वितर्क की योग्यता ही नहीं है, महान मोह से तिरस्कृत हैं, विरुद्ध प्रवृत्तियां करते रहते हैं, ऐसे प्राणियों में माध्यस्थ्यभावना रखनी चाहिए, क्योंकि ऐसे जीवों में हित का उपदेश भी सफल नहीं होता । ऐसे इन चार भावनाओं द्वारा अहिंसा व्रत की परिपूर्णता होती है । अब यह जिज्ञासा होती है कि व्रतों की परिपूर्णता के लिए जो भावनायें बतायी गई हैं, क्या मुमुक्षु महाव्रतधारी पुरुषों को उतनी ही भावनायें करना चाहिएँ या कुछ और भी उनके योग्य चिंतन है? उसके उत्तर में सूत्र कहते हैं।


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