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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-32

From जैनकोष



कंदर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ।।7-32।।

(201) अनर्थदंडविरति व्रत नामक शील के कंदर्प कौत्कुच्य व मौखर्य अतिचार―अनर्थदंडव्रत के 5 अतिचार इस प्रकार है―(1) कंदर्प―चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से उत्पन्न हुए राग के वेग से मजाक संयुक्त जो अविशिष्ट वचनों का प्रयोग होता है उसे कंदर्प कहते हैं । यह कंदर्प-अनर्थ-दंड है अथवा उसने साक्षात् कोई बध आदिक नहीं किया फिर भी बिना प्रयोजन ही इस प्रकार के वचन का प्रयोग करना उचित नहीं है । उसे अनर्थदंड विरति का अतिचार कहा गया है । (2) कौत्कुच्य―राग के वेग से तो हास्यमयी वचन बोले जाते हैं, सो वह हास्य भरा तो है ही, पर साथ ही वे अशिष्ट अभद्र वचन हैं ये दोनों ही बातें जब दूसरे के प्रति खोटे काय की प्रवृत्ति के साथ की जाती हैं तो उसे कौत्कुच्य कहते हैं अर्थात् खोटी हंसी के वचन बोलना, बुरे वचन बोलना और उसके साथ ही साथ शरीर की बुरी चेष्टा दिखाना यह कौत्कुच्य कहलाता है । (3) मौखर्य―अभद्रता से जो कुछ भी अनर्थ बहुत वचन बोलना, अधिक बकवास करना मौखर्य कहलाता है । जो मनुष्य अधिक बोलता है उससे कितने ही अनर्थ हो जाया करते हैं इस कारण बकवास करना अनर्थदंडविरति का अतिचार हैं ।

[202] अनर्थदंडविरति व्रत का असमीक्ष्याधिकरण नामक अतिचार―[4] असमीक्ष्यअधिकरण अर्थात् बिना विचारे ही कुछ अधिक प्रवृत्ति कर डालना । प्रयोजन तो इसमें कुछ भी नही विचारा गया कि मैं किसलिए ऐसी प्रवृत्ति करूं और यों ही किसी विषय में भोगप्रवृत्ति कर लेना यह अनर्थदंडविरति का चौथा अतिचार है । यह अधिकरण तीन प्रकार से होता हैं―शरीर द्वारा अधिक प्रवृत्ति, वचन द्वारा अधिक प्रवृत्ति, कायअधिकरण तो यह है कि प्रयोजन के बिना जाना हुआ, ठहरा हुआ, खड़ा होता हुआ, बैठता हुआ सचित्त अचित्त पत्र फूल फलों का छेदन करना, भेदन करना, कूटना, फेंक देना यह कायिक अधिकरण है तथा अग्नि विष आदिक वस्तुवों का प्रदान प्रारंभ करना यह सब बिना विचारे कायिक अधिकरण है । बिना विचारे वाचनिक अधिकरण क्या है कि बिना प्रयोजन कथा कहानियों का वर्णन करना तथा दूसरों को पीड़ा पहुंचे इस प्रकार का कुछ भी वचन बोला जाना यह वाचनिक अधिकरण है । मानसिक अधिकरण क्या है? दूसरे का अनर्थ करने वाली बात विचारना अथवा रागभरे काव्य आदिक का चिंतन करना यह सब मानसिक बिना विचारे अधिकरण है ।

(203) अनर्थदंडविरति व्रत का उपभोगपरिभोगानर्थक्य नामक पचंम अतिचार―[5] जितने पदार्थों से उपभोग परिभोग हो सकते हैं उसके लिए उतने ही पदार्थ रखने बताये गए हैं, । उसने अतिरिक्त रखना गह भोगोपभोगानार्थक्य नामक, अतिचार कहलाता है । यहाँ एक शंका होती है कि भोगोपभोग की चीजें अधिक रखना यह तो भोगोपभोग परिमाण व्रत में बताया ही जा चुका है । इसका उस ही व्रत में अंतर्भाव हो जायेगा । फिर इसे कहना पुनरुक्त कहलाता है, अत: इसका ग्रहण न करना चाहिए । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह शंका यों युक्त नहीं है कि भोगोपभोग परिमाण व्रत का अर्थ और यह कहा गया पंचम अतिचार का अर्थ शंकाकार ने ठीक तरह से नहीं समझा । भोगोपभोग परिणाम व्रत में तो अपनी इच्छानुसार भोग और उपभोग की वस्तुओं का परिमाण किया गया था और इस तरह अन्य वस्तुविषयक पापवृत्ति का पूरा त्याग हो चुका था । इस सूत्र में जो पंचम अतिचार कहा है उसका प्रयोजन यह है कि पहले भोगोपभोग परिमाणव्रत में जितना भी वस्तु का परिमाण किया गया है उस परिमाण किए गए के अंदर ही जो बात अनावश्यक है उसे रखना यह पंचम अतिचार कहलाता है । फिर भी एक शंका हो सकती है कि भोगोपभोग परिमाणव्रत के अतिचार कहे गए थे, उस ही में इसका अंतर्भाव हो जायेगा, सो भी शंका ठीक नहीं है । उनके भोगोपभोग परिमाण व्रत के जो अतिचार कहे गए हैं वे सचित्त आदिक के संबंधरूप से मर्यादा का उल्लंघन करने की सूचना के लिए थे । यहाँ वह प्रयोजन नहीं रखा गया है । ये सब अनर्थदंड व्रत के अतिचार बताये गए हैं । अब सामायिक नामक शिक्षाव्रत के अतिचार कहते है ।


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