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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 8-8

From जैनकोष



सदसद्वेद्ये ।।8-8।।

(261) सातावेदनीय की उत्तरप्रकृतियों का विवरण―सातावेदनीय और असातावेदनीय ऐसी दो उत्तरप्रकृतियाँ वेदनीय कर्म की हैं, जिनके उदय से देवादिक गतियों में जहाँ कि बहुत प्रकार के सांसारिक आराम हैं, शारीरिक मानसिक सुखों की प्राप्ति हो, उसे सातावेदनीय कहते हैं । सद्वेद्य शब्द में सत् और वेद्य ऐसे दो विभाग हैं । सत् मायने भला, शुभ, प्रशस्त, इष्ट है तथा वेद्य का अर्थ अनुभव करने योग्य है । सातावेदनीय के उदय से दो कार्य होते हैं―एक तो इष्ट वस्तुवों की प्राप्ति होना और दूसरा―इंद्रिय द्वारा सुख रूप से अनुभव बनना । जिस कर्म के उदय से अनेक प्रकार के दुःख हों, नारकादिक गतियों में जैसे शारीरिक मानसिक नाना दुःख पाये जाते हैं ऐसे कठिन दुःख होना, इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग, शरीर की व्याधियों का होना, दूसरे के द्वारा वध होना, पीटा जाना, बंधन होना, जन्म, जरा, मरण होना ये दुःख जिसके फल हैं वह सब असातावेदनीय है । असद्वेद्य में दो भाग हैं―(1) असत् और (2) वेद्य । असत् का अर्थ है अशुभ, अप्रशस्त, अनिष्ट और वेद्य का अर्थ है वेदन में आना । असाता वेदनीय के उदय से अनिष्ट दुःख के हेतुभूत पदार्थ और घटनाओं का संयोग होता है । और इंद्रिय द्वारा असाता रूप से वेदन होता है । इस प्रकार वेदनीय कर्म की दो उत्तर प्रकृतियों का वर्णन हुआ, अब क्रम प्राप्त मोहनीय के 28 भेदों का वर्णन करते हैं ।


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