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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 30

From जैनकोष



तथानुतिष्ठता दर्शनम्लानता मूलतोऽपि न कर्तव्येत्याह --


भयाशास्नेहलोभाच्च कुदेवागमलिङ्‍गिनाम्
प्रणामं विनयं चैव न कुर्य्युः शुद्धदृष्टयः ॥30॥


टीका: 

शुद्धदृष्टयो निर्मलसम्यक्त्वा: न कुर्यु: । कम् ? प्रणामम् उत्तमाङ्गेनोपनतिम् । विनयं चैव करमुकुलप्रशंसादिलक्षणम् । केषाम् ? कुदेवागमलिङ्गिनाम् । कस्मादपि ? भयाशास्नेहलोभाच्च भयं राजादिजनितम्, आशा च भाविनोऽर्थस्य प्राप्त्याकाङ्क्षा, स्नेहश्च मित्रानुराग:, लोभश्च वर्तमानकालेऽर्थप्राप्तिगृद्धि: भयाशास्नेहलोभं तस्मादपि। च शब्दोऽप्यर्थ: ॥३०॥




सम्यग्दर्शन को धारण करने वाले जीव को प्रारम्भ से ही उसमें मलिनता नहीं करनी चाहिए, यह कहते हैं-




भयाशास्नेहलोभाच्च कुदेवागमलिङ्‍गिनाम्

प्रणामं विनयं चैव न कुर्य्युः शुद्धदृष्टयः ॥30॥


टीकार्थ:

राजा आदि से उत्पन्न होने वाले आतंक को भय कहते हैं । भविष्य में धनादिक-प्राप्ति की वांछा आशा कहलाती है। मित्र के अनुराग को स्नेह कहते हैं । वर्तमानकाल में धन प्राप्ति की जो गृद्धता अर्थात् आसक्ति होती है, उसे लोभ कहते हैं । जिसका सम्यक्त्व निर्मल है ऐसा शुद्ध सम्यग्दृष्टि जीव इन चारों कारणों से अर्थात् भय, आशा, स्नेह, लोभ के वश से कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरु को न तो प्रणाम करे, मस्तक झुकाकर नमस्कार करे और न उनकी विनय करे- हाथ जोड़े तथा न प्रशंसा आदि के वचन कहे ।



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