भाया थारी बावली जवानी चाली रे

From जैनकोष

भगवान भजन तूं कद करसी थारी गरदन हाली रे ।।टेक ।।
लाख चोरासी जीवाजून में मुश्किल नरतन पायो ।
तूं जीवन ने खेल समझकर बिरधा कीयां गमायो ।।
आयो मूठी बाँध मुसाफिर जासी हाथा खाली रे ।।१ ।।
झूँठ कपट कर जोड़ जोड़ धन कोठा भरी तिजोरी रे ।
धर्म कमाई करी न दमड़ी कोरी मूँछ मरोड़ी रे ।।
है मिथ्या अभिमान आँख की थोथी थारी लाली रे ।।२ ।।
कंचन काया काम न आसी थारा गोती नाती रे ।
आतमराम अकेलो जासी पड़ी रहेगी माटी रे ।।
जन्तर मन्तर धन सम्पत से मोत टले नहीं टाली रे ।।३ ।।
आपा पर को भेद समझले खोल हिया की आँख रे ।
वीतराग जिन दर्शन तजकर अठी उठी मत झाँक रे ।।
पद पूजा `सौभाग्य' करेली शिव रमणी ले थाली रे ।।४ ।।