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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2074

From जैनकोष



वदंति योगिनो ध्यानं चित्तमेवमनाकुलम् ।

कथं शिवत्वमापन्नमात्मानं संस्मरेन्मुनि: ।।2074।।

मुक्तिप्राप्त सिद्ध प्रभु के स्मरण में अनाकुल चित्त की संभवता पर प्रश्न―क्षोभरहित परिणाम को ध्यान कहते हैं । जहाँ आकुलता न हो ऐसे एकाग्र चित्त को योगीजनों ने ध्यान बताया है । ऐसी बात सुनकर बात तो ठीक है कि नहीं, लेकिन सुनकर जो कोई विवेकी पुरुष है उसने या तो किसी प्रकार की आशंका मिटाने के लिए यह प्रश्न किया है या प्रकरण को स्पष्ट कराने के लिये यह प्रश्न किया है कि जब क्षोभरहित परिणाम का नाम ध्यान है तो मोक्ष प्राप्त आत्मा का अर्थात् सिद्ध भगवान का कोई स्मरण कैसे करें, क्योंकि ध्यान करने वाला है यह मुनि । और ध्यान किया जा रहा है मोक्ष प्राप्त सिद्ध भगवान का । तो जहाँ यह द्विविधा है―ध्यान और है, ध्येय और है तो ऐसे ध्येय को उपयोग में लेने से तो क्षोभ होगा । इस प्रश्न के उत्तर में कह रहे हैं―


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