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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2172

From जैनकोष



सूक्ष्मक्रियं ततो ध्यानं स साक्षात् ध्यातुमर्हति ।

सूक्ष्मैककाययोगस्थस्तुतीयं यद्धि पठते ।।2172।।

सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति शुक्लध्यान के अधिकारी―तदनंतर उनके सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाती नाम का तृतीय शुक्लध्यान प्रकट होता है । अब आपने जाना होगा कि यह तीसरा शुक्लध्यान न तो मनोयोग के समय रहा । सिर्फ औदारिक काययोग के समय जब कि सूक्ष्म काययोग रहा तब यह सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति शुक्लध्यान हुआ । जहाँ सूक्ष्म काययोग रहा वह है सूक्ष्मक्रिय, अब ये अयोगकेवली अवस्था में पहुंचने के सम्मुख हैं उस समय यह सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाती नाम का शुक्लध्यान प्रकट होता है । यह इस समय सूक्ष्मकाययोग में विराजे हैं । यहाँ उनका तृतीय शुक्लध्यान है । यह प्रकरण शुक्लध्यान का चल रहा है । पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान 8वें गुणस्थान से लेकर रे 11वें गुणस्थान तक अविरल रूप से रहा और क्षपक श्रेणी से चलने वाले साधुवों के 10वें गुणस्थान के बाद सीधा 12वां गुणस्थान होता है । तो उसके प्रारंभ में थोड़े समय पहिले शुक्लध्यान रहता है, बाद में यह द्वितीय शुक्लध्यान होता है । देखिये सब शुक्लध्यानों का प्रताप वर्तमान शुक्लध्यान के बल से तो मोहनीय कर्म का नाश हुआ था और द्वितीय शुक्लध्यान के बल से शेष तीन घातिया कर्मो का नाश हुआ । अब इस सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति नामक शुक्लध्यान के बल से बहुत कर्मों की स्थितियाँ अनुभाग ये सब्र जीर्णशीर्ण हो जाते हैं । उस समय केवल 85 प्रकृतियाँ शेष रहती हैं, उनकी कैसे निर्जरा होती है, इसकी बात आगे कहेंगे ।


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