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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 618

From जैनकोष



संकल्पवशतस्तीव्रा वेगा मंदाश्च मध्यमा:।

कामज्वरप्रकोपेन प्रभवंतीह देहिनाम्।।

काम के पाँचवें वेग में शरीर का दग्ध होना- काम के 5 वें वेग में यह शरीर जलने सा लगता है। जैसे दाह की उत्पत्ति हुई हो ऐसा शरीर दग्ध होने लगता है, क्षीण होने लगता है। तब समझिये कि जैसे किसी को पुराना ज्वर हो जाय, टी. वी. जैसा कोई ज्वर हो जाय तो उसका शरीर कितना दुर्बल हो जाता है? भीतर में उसकी बड़ी तेज गर्मी होती है। चाहे शरीर के बाहर गर्मी न मालूम पड़े, किंतु जिसके पुराना ज्वर है हड्डी पर ज्वर है, टी. बी. का ज्वर है उसके अंदर से तृष्णा उत्पन्न होती है। यहाँ तक कि उसके हाथ पैर भी बहुत जलने लगते हैं। तो यहाँ काम के वेग में ऐसी हालत होने लगती है कि यह शरीर दग्ध होने लगता है।

काम के छठवें वेग में भोजन का नहीं रुचना- फिर छठवें वेग में भोजन भी इसे नहीं रुचता। कैसा उपयोग इसका खोटे विषय की ओर तेजी से गया है कि जिस कुवासना के कारण इसे भोजन भी नहीं रुचता। जो अन्न, जो भोजन प्राणों का आधारभूत है, शरीर की स्थिति रखने का कारण है वह भी रुचिकर नहीं लगता। यों छठे वेग में इसकी ऐसी दयनीय दशा हो जाती कि खाना भी छूट गया, मित्रजन परिवार के लोग मनाते हैं भाई खावो, जिस किसी को पता ही न हो वह समझायेगा क्या? अगर पता हो कि अमुक कुंवर साहब ऐसे ज्वर से पीड़ित हैं तो परिवार के लोग भी उसके लिए अथक श्रम करने लगते। तो छठे वेग में भोजन भी नहीं रुचता।

काम का सप्तम वेग महामूर्छा- जब काम का सातवाँ वेग आता है तो इसे महामूर्छा हो जाती है। बेहोश पड़ जाता है, ढीले ढाले हाथ पैर फेंककर बड़ी लंबी श्वास लेकर पड़ जाता है। कोई पूछे कि तुझे रोग क्या हुआ है, कौनसी पीड़ा हुई है तो कोई क्या बताये? कोई रोग नहीं, पीड़ा नहीं, कोई पीटता नहीं, कुछ बात नहीं, बस मन की बात कल्पना बना ली, उस कल्पना के अनुसार संयोग न हो सका तो वह अचेत हो जाता, बेहोश हो जाता। कोई कुछ कहे तो सुनाई भी नहीं देता।

काम का अष्टम वेग उन्मत्तता- 8 वें वेग में यह पुरुष उन्मत्त हो जाता है, पागल हो जाता है। यहाँ से वहाँ दौड़ता घूमता है, हैरान होता है, परेशान होता है, यों काम के अष्टम वेग में उन्मत्त जैसी चेष्टायें हो जाती हैं। जैसे पुराणों में सुना गया है, कुछ पुरुषों के बारे में अथवा आधुनिक सिनेमा थियेटर वगैरह में भी घटनाएँ दिखती हैं कि अनेक मनुष्य इसी से पागल हो जाते हैं। और, जब दिमाग ही फेल हो गया तब तो बेइलाज हो गया। जब तक बुद्धि ठिकाने है, ज्ञान सही है, दिमाग फेल नहीं हुआ तब तक तो किसी का समझाना भी काम करेगा। जब दिमाग ही उल्टा बन गया फिर समझाने का भी इलाज नहीं बनता। यों काम के 8 वें वेग में यह पुरुष उन्मत्त हो जाता है।


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