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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 837

From जैनकोष



यमप्रशमजं राज्यं तप:श्रुतपरिग्रहं।

योगिनीऽपि विमुंचंति वित्तवेतालपीडिता:।।

धनपिशाच पीड़ित योगियों की यमप्रशमज राज्य से वंचितता- जो पुरुष धनरूपी पिशाच से पीड़ित है ऐसा योगी मुनि भी यम नियम प्रशम तपश्चरण शास्त्रस्वाध्याय इन सबको छोड़ देता है। जब मन परपदार्थों में आसक्त रहता है तो यह उपयोग यह धुन उस परपदार्थ के लिए ही रहेगी और ऐसे विकृत मन के होने पर वहाँ यम भी लिया हो, कोई प्रतिक्रम भी किया हो तो उसे भी छोड़ देता है क्योंकि चित्त परपदार्थों में व्यथित हो गया। अब वह परपदार्थों का संग्रह करने में ही अपना हित समझता है। जिसकी जिस ओर रुचि लग गयी वह उस ओर ही अपना हित समझता है। तो यह एक बड़ा संकट है जो परपदार्थों में मन लग जाय, स्नेह जग जाय। क्योंकि उससे अशांति ही अशांति है। शांतस्वरूप निज अंतस्तत्त्व की वहाँ दृष्टि नहीं है और ऐसी बाहर पड़ी हुई दृष्टि वाले पुरुष विह्वल रहा करते हैं क्योंकि अपने उपयोग को कहीं स्थिरता से जमाने का झुकाव तो नहीं मिल रहा, तो ऐसे पुरुष आजीवन लिए हुए नियम को छोड़ देते हैं, और जो कुछ समय के लिए नियम लेते हैं वे भी छोड़ देते हैं। जिन योगीश्वरों ने कदाचित् कर्मप्रेरणावश अपनी शिथिलता से कोई किसी बाह्यपरिग्रह की आशा लग जाय और उस आशा से पीड़ित हो जाय तो वह प्रशम अर्थ का भी परित्याग कर देता है अर्थात् शांति को दूर कर देता है। आत्मीय सत्य आनंद की प्रीति नहीं रहती। प्रतीति में केवल बाह्यपदार्थ ही बस गए ऐसे पुरुष तपश्चरण को भी छोड़ देते हैं। तपश्चरण में उनको बड़ा कष्ट मालूम होता है। जो किसी भी विषय पिशाच से पीड़ित हो गए हों या बाह्य धन वैभव की इच्छा करने लगे हों उन्हें तपश्चरण क्या सुहायेगा, शास्त्रस्वाध्याय को भी छोड़ देते हैं। जिनके बाह्यपदार्थों में आसक्ति हो गयी उनके फिर ज्ञानवार्ता में मन नहीं लग सकता। जो पुरुष अपने को निष्परिग्रह रखते हैं, अपने को नि:संग अनुभव करते है मेरा कहीं कुछ नहीं है, केवल यह गुणपर्याय ही मेरा है, मेरे आत्मा के ज्ञान, दर्शन, चारित्र, शांति, आनंद, ये सब मेरे तत्त्व हैं, मेरा जो विशुद्ध परिणमन है वही मेरा वैभव है, मेरे गुणपर्याय के सिवाय अन्य कुछ भी चीज मेरी नहीं है। ऐसा जिनका अनुभव है वे योगीश्वर अपने आपमें विशुद्ध आनंद का अनुभव करते हैं। इसके विरुद्ध जिनको धन की कोई आशा लग गयी, उस पिशाच से जो पीड़ित हो गए वे आजीवन ग्रहण किए हुए नियम को भी छोड़ देते हैं, और अवधि लेकर ग्रहण किए हुए नियम को भी छोड़ देते हैं, श्रद्धा, शांति, तपश्चरण, स्वाध्याय सबका त्याग कर देते हैं। यह परिग्रह ही अनर्थ का मूल है। जो परिग्रह से दूर रहेंगे वे ही पुरुष आत्मध्यान के पात्र बनेंगे और आत्मध्यान करके एक अपने आपमें अपने उपयोग को मग्न करके मोक्ष प्राप्त कर सकेंगे।

श्लोक- 838

पुण्यानुष्ठानजातेषु नि:शेषाभीष्टसिद्धिषु।

कुर्वंति नियतं पुंसां प्रत्यूहं धनसंग्रहा:।।

धनसंग्रह से सिद्धिविघात- धन का संग्रह पुरुषों की सिद्धि में विघ्न करता है। आत्मा अतुल सत्य का भंडार है। जितने लोक में सातिशय चमत्कार कहे जाते हैं, ज्ञान का चमत्कार, विशाल ज्ञान हो और लूकी छुपी भूत भविष्य की बातों को भी बता सके ऐसा ज्ञान हो, ऐसा ज्ञान का चमत्कार भी इस ही आत्मा के भंडार से उत्पन्न होता है। लोक में ऐसा आतिशयभूत चमत्कार देखकर लोग आश्चर्य करें, जिनकी देव सहायता करें, ऐसे चमत्कार भी इस आत्मा के ही ध्यान का फल है। जो एक आत्मतत्त्व को छोड़कर बाह्य वैभव के संग्रह की आकांक्षा करते हैं उनके समस्त मनोवांछित फल की प्राप्ति नहीं होती और एक इस सहज शुद्ध ज्ञानस्वरूप की जो उपासना करते हैं उनको समस्त कार्यसमूह की मनोवांछित की सिद्धि होती है, उनमें ऐसी सिद्धि प्रकट हो जाती है कि जो भी चाहते हैं उसकी सिद्धि अनायास प्रकट हो जाती है। और, जिसे जो कुछ मिला है वैभव संपदा वह सब भी इस आत्मसिद्धि के भंडार से ही मिला है। उसे यों समझिये कि जिस पुरुष के कुछ निर्मलता रहती है, दान की, परोपकार की जिसकी भावना बनी रहती है, दूसरे जीव सुखी हों ऐसी जिसकी निरंतर भावना रहती है, जिसकी कषाय मंद हैं, विषय भोगों में जिसकी उत्सुकता नहीं है ऐसे धर्म परिणाम में जो पुरुष रहता है उसके पुण्यबंध होता है, उसका ही परिणाम है कि लाखों की विभूति उसके पास है। यह बाह्य जड़ विभूति भी इस आत्मभंडार से ही प्राप्त होती है। इस आत्मपरिणाम की निर्मलता से पुण्यबंध होता है, उसके उदय से वैभव समृद्धि प्राप्त होती है तो इसका भी मूलकारण आत्मपरिणाम ही रहा। यदि आत्मपरिणाम को संभाल सके तो समस्त मनोवांछित सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा अगर न कर सके, केवल बाह्य धन की ओर ही आशा लगाये रहे तो समस्त सिद्धियाँ विघ्न उत्पन्न करती हैं। सब कुछ परिणामों पर निर्भर है। भगवान के गुणों में अनुराग जगने से जो भगवान का भक्त बनता है उसके विशिष्ट पुण्य का बंध होता है। और कोई धन की आशा रखकर, मुकदमा जीतने की आशा रखकर या अन्य-अन्य कुछ अधिकार प्राप्त कर लेने की आशा रखकर प्रभु पूजा करता है उसे पुण्य का बंध नहीं होता। वह तो भगवान में भी अवगुण ही निरख रहा है। भगवान मुझे धर्म का लाभ करा दें, पुत्रादिक का लाभ करा दें, मुकदमा जीता दें, यह प्रभु में अवगुण देखना ही तो है। तो जो लोग ऐसी आशा लेकर प्रभु की भक्ति करते हैं उनके पुण्य का बंध नहीं होता। जो प्रभु के गुणों का अनुरागी है, उनके स्वरूप को निरखकर ऐसा ही मेरा स्वरूप है, यही मोक्षमार्ग है, यों जो केवल उस शुद्ध तत्त्व को निरखता है ऐसे गुणानुराग की दृष्टि से जो प्रभुपूजन करता है उसके पुण्य का बंध होता है। जो प्रभुभक्ति करके चाहे कुछ नहीं उसके ऐसा पुण्य बनता है कि उसे मनोवांछित सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। तो बाह्यपदार्थों की चाह रखना यह समस्त सिद्धियों में विघ्न करती है।


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