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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 914

From जैनकोष



नि:शेषक्लेशनिर्मुक्तममूर्त्तं परमाक्षरम्।

निष्प्रपंचं व्यतीताक्षं पश्य स्वं स्वात्मनि स्थितम्।।

अपने को नि:संकट अविनाशी देखने का उपदेश- हे आत्मन् ! तू अपने आत्मा में ही रहता हुआ अपने को सब क्लेशों से रहित अमूर्तिक परम अविनाशी विकल्पों से रहित इंद्रिय से दूर अतींद्रियस्वरूप को देख। तू अपने आपको ही निरख कि मुझे कोई क्लेश नहीं है। देखिये यह बहुत बड़े काम का विचार है। कोई पुरुष किसी भी स्थिति में हो, जिससे वह खुद भी समझे कि हम बड़ी आपत्ति में हैं, लोग भी जानें कि यह बड़े संकट में फंसा है ऐसी भी परिस्थिति में हो, कोई और वह चाहे तो वहाँ भी अपने को यों समझ सकता है कि मुझे कोई क्लेश ही नहीं है। क्लेश तो लोग कल्पनाएँ करके बना डालते हैं, जिसकी जो भी परिस्थिति हो उस ही परिस्थिति में उसे यों निरखना चाहिए कि मैं तो क्लेशरहित हूँ, यहाँ किस बात का क्लेश मानना? धन वैभव की हानि हो गयी तो उससे मेरा क्या बिगाड़ हो गया, वे तो परपदार्थ हैं। यह मैं तो पूरा का पूरा हूँ, और यहाँ तो मेरी कुछ भी हानि नहीं हुई है ऐसा जो पुरुष समझता रहता है उसे किसी भी परिस्थिति में क्लेश का अनुभव नहीं होता है। यों तो अच्छी स्थिति में रहता हुआ भी कोई अपने को दु:खी अनुभव कर सकता है।

तो हे आत्मन् ! प्रथम तो तू अपने आत्मा में रहता हुआ अपने को समस्त क्लेशों से रहित अनुभव कर क्योंकि तू तो एक अमूर्तिक पदार्थ है, एक ज्ञानप्रकाशमात्र है। इसका किसी भी परपदार्थ से कोई संबंध नहीं जुड़ा हुआ है। अपने उस अमूर्त स्वरूप को देख जो कि परम अविनाशी है, जिसका कभी भी विनाश न होगा। जिसमें कोई इंद्रियां ही नहीं है, वह तो एक ज्ञानपुंज है, आकाशवत् निर्लेप है, आकाश अचेतन है और यह ज्ञानपुंज है। जैसे हम आकाश के स्वरूप का विवरण करना चाहें तो क्या विवरण करें? है आकाश और अपना कोई अनिर्वचनीय स्वरूप रखे हुए है, वहाँ कुछ पकड़ने का, देखने का, सूँघने का कुछ पाया जाता हो आकाश में तो उसका कुछ ब्योरा बनाये। सही मायने में जब हम आकाश के स्वरूप का निर्णय करते हैं तो यह देखते हैं- है तो यह और अनिर्वचनीय अमूर्तिक है। यों ही जब हम आत्मतत्त्व के विशेषण में चलते हैं तो ज्ञात होता है कि हूँ तो यह मैं केवल ज्ञानपुंज। जो जानता है बस वही मैं आत्मतत्त्व हूँ, अपने को ऐसा अमूर्तिक और अविनाशी अनुभव कर। हे आत्मन् ! तेरा स्वरूप तो ज्ञानमात्र है। विकल्प तेरे स्वरूप में नहीं है, इंद्रियां तेरे स्वरूप में नहीं हैं ऐसा तू अपने को एक अतींद्रिय ज्ञानमात्र अनुभव कर। इस आत्मध्यान के प्रसाद से कर्मक्लेश दूर होंगे, जन्ममरण की परंपरा मिटेगी, निर्वाण की प्राप्ति होगी।


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