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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 181

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णवि कम्मं णोकम्म णवि चिंता णेव अट्टरुद्दाणि।

णवि धम्मसुक्कझाणे तत्थेव य होइ निव्बाणं।।181।।

उपाधियों का संसारी जीवों के सद्भाव व निर्वाण में अभाव—जीवों के 2 प्रकार की अवस्थाएँ होती हैं—एक संसार अवस्था और एक मुक्त अवस्था। हम आप सब जीव संसार अवस्था में हैं। संसार अवस्था उसे कहते हैं जहाँ जीव के साथ कर्म लगा हो, शरीर लगा हो, रागद्वेष, विषय-कषाय, चिंता और अनेक प्रकार की अंतर में बाधाएँ चल रही हों वह संसार अवस्था है और मुक्त अवस्था उसे कहते हैं जहाँ कर्म, शरीर, संक्लेश, क्लेश, सुख-दु:ख, जीवनमरण आदिक दोष एक भी नहीं रहते हैं। संसार अवस्था निष्कृष्ट अवस्था है। इस अवस्था में हम आप कुछ सुयोगवश आज अच्छी स्थिति में आये हैं, मनुष्य हुए हैं, श्रेष्ठ मन मिला है। दूसरे के भाव को हम समझ सकते हैं, अपने भाव को हम दूसरे को बता सकते हैं। इतनी श्रेष्ठ अवस्था मिली तो है, किंतु इसका विश्वास नहीं है कि यह अवस्था हमें आगे भी मिलेगी। देखिये, पशु-पक्षी आपस में कहीं बैठ भी जायें तो भी एक दूसरे को अपना भाव जताने में असमर्थ हैं, न वे कहीं भाषण दे सकते हैं, न आपस में बातें कर सकते हैं। इस नरदेह में अनेक कलायें विकसित हैं, किंतु उस सुख का हम क्या हर्ष मानें जो सुख आसक्ति से भोगे जाने के कारण आगे कोई बड़े दु:ख रूप में प्रकट होगा। मोही जीवों को भविष्य के दु:खों का ध्यान नहीं है इस कारण सुख में हर्ष मानते हैं। ध्यान आ जाय कि इसका फल बहुत बुरा है तो उस सुख में आसक्ति न हो सकेगी। मुग्ध मानव का अशुभ ध्यान और प्रयत्न—इस मनुष्यभव में कितने प्रकार के नाना मौज माने जा रहे हैं, यह मौज भी क्षोभरूप हैं, इनमें विशुद्ध आनंद नहीं है, बाहरी तत्त्वों में इनका उपयोग फँसता है। बाहरी तत्त्वों से भीख मांगते हैं, आशा बनाते हैं, मुझे विषयों से सुख मिलेगा, मुझे लौकिक यश से आराम मिलेगा, सो जनता के भी अधीन बनना है अंतरंग से व नाना क्लेश पाया करता है। वर्तमान में भी तो इन सांसारिक सुखों में आनंद नहीं है। भावी काल में तो इन छोटे मौजों के मानने का फल अति भयानक होगा। न हुए मनुष्य, हो गये पशु-पक्षी अथवा कीड़े-मकौड़े तो वहाँ क्या स्थिति होगी? आज तू अपनी झूठी पोजीशन संभाल रहा है, आगा-पीछा कुछ नहीं विचारता है, दूसरे के सम्मान की भी अवहेलना कर देता है, जिस प्रकार से यश बढ़े, अथवा विषय—साधना बनें वैसा ही यत्न किया करता है। विमोच्य विभावपरिणमन—हे आत्मन् !अब उद्दंडता से विराम ले, देख तेरी अवस्था दो प्रकार की होती है—एक संसार अवस्था और एक मुक्त अवस्था। तू संसार अवस्था में आराम मत मान। तेरे आराम का साधन मुक्त अवस्था ही है। अपने आपमें ऐसी भावना बना कि मुझे संसार के संकटों से मुक्त होना है; शरीर और कर्मों के बंधन से विमुक्त होना है। उस मुक्त स्थिति में क्या रहेगा? उसका इस गाथा में वर्णन चल रहा है। निर्वाण में कर्म नहीं हैं, कर्म उसे कहते हैं जो बनावट का परिणाम करे। जो स्वाभाविक चीज होती है, वह की नहीं जाती वह तो होती है। जो की जाने वाली बात है वह बनावटी होती है। कौन राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, काम विकार ये स्वभावत: किया करता है, ये आत्मा में नहीं होते हैं, होने वाली बात अच्छी है और की जाने वाली बात अच्छी नहीं होती है। किन्हीं प्रतिपक्षी तत्त्वों की प्रेरणा से करना पड़ता है। वह स्वाभाविक चीज नहीं है। कर्म और क्लेश—जो परिणाम किया जाय उसका नाम कर्म है, आत्मा जानता है इसका नाम कर्म नहीं है क्योंकि आत्मा का जानने का स्वभाव है। आत्मा में जानन अपने आप हो रहा है। इस संसार अवस्था में कमजोर स्थिति में हम आप जान-बूझ कर प्रयत्न लगाकर, दिमाग लगाकर जो जानते हैं यह जानना तो कर्म बन गया है, पर प्रयत्न लगाये बिना, कुछ तरंग उठाये बिना अपने आपमें जो स्वयं जानन होता है वह जानन कर्म नहीं है। कर्मों की प्रकृति क्लेश पहुँचाने की होती है। हम विकल्पपूर्वक जानें उससे भी क्लेश होता है ऐसे जानने के साथ जो रागांश लगा है वह कर्म है। हम विकल्पपूर्वक जानें अनुराग करें, राग-विरोध करें उससे भी क्लेश होता है। आत्मा में क्लेश न हो उसका सुगम उपाय आत्मविश्राम है। श्रम से कष्ट होता है, श्रम दूर करने से विश्राम मिलता है, यह मैं आत्मा कर्मों से रहित हूँ, मेरा स्वभावमात्र लोक-अलोक को जानने देखने का है। जानन-देखने के अपने बड़प्पन से कुछ और आगे बढ़े, परपदार्थों में कुछ चाह की, बस वहीं बंधन हो गया। ज्ञानाश्रय बिना सर्वत्र ठोकरें—यह मैं आत्मस्वरूप स्वयं अपने आप कैसा हूँ, इसका इस समय वर्णन चल रहा है। यह अपने अंतस्तत्त्व के एक मर्म का प्रतिपादन है, जब हम अपने आपमें भीतरी तत्त्व को नजर में न ले सकेंगे, ज्ञानदृष्टि में न सँभाल सकेंगे तब तक फुटबाल की तरह यहाँ से वहाँ ठोकर खा-खाकर भटकना ही पड़ेगा। हम जिन बाह्य पदार्थों को अपने समीप लेना चाहते हैं, जिन जीवों की हम शरण पहुँचना चाहते हैं सुख की आशा से, उन सब जीवों से उन सब पदार्थों से हमें ठोकर ही मिलती है, शांति नहीं मिलती। कोई ठोकर सुहावनी लग रही है, कोई असुहावनी लग रही है, किंतु बाह्य पदार्थों के संग-प्रसंग से इस आत्मा को ठोकर ही मिलती है। शांति तो इस आत्मा में अपने आप मौजूद है, उल्टा जो कदम बढ़ाया है उसे बंद कर दें तो शांति, आनंद अभी भी स्वयं अपने आप है। न कुछ-सी बात पर विसंवाद का तूमाल—मैं आत्मा तो केवल ज्ञानप्रकाश मात्र हूँ, पर मान रक्खा है देह को लक्ष्य में लेकर कि ‘यह मैं हूँ।’ बस इसी बड़ी भूल के मूल पर यह विशाल संसारवृक्ष खड़ा हो गया है, जैसे कभी-कभी न कुछ-सी बात पर यहाँ भी झगड़ा बढ़-बढ़कर बहुत बड़ा हो जाता है, यहाँ तक कि किन्हीं दो भाईयों में यदि झगड़ा बढ़ जाय तो दोनों अपनी लाखों की जायदाद बरबाद कर डालें। उनसे पूछा जाय बाद में कि क्यों भाई ! इतना झगड़ा क्यों बढ़ गया? तो वे बतावेंगे। अच्छा इसका कारण क्या हुआ, ऐसा पूछते जावो तो अंत में उसका कारण ऐसा तुच्छ मिलेगा कि जिसको सुनकर आपको हँसी आयेगी। तुच्छ कारण से प्रारंभ होकर यह झगड़ा खड़ा होता है और बढ़—बढ़कर बहुत बड़ी विपदावों का रूप रख लेता है। जैसे मान लो दो भाईयों के बँटवारे पर दो चार इंच भूमि पर विवाद हो गया, बड़ी-बड़ी चीजों का झगड़ा तो निपट गया पर तीन चार इंच भूमि पर मैं-मैं तू-तू हो गया, विवाद बढ़ गया, मारपीट हो गयी, मुकद्दमा चल गया। बढ़ते-बढ़ते दोनों ने अपनी लाखों की जायदाद को बरबाद कर डाला। इतनी बड़ी विपदा का सबसे मूल में कारण कितना था? बहुत छोटा, जिसको सुनकर हँसी आ सकती है। काल्पनिक मूल त्रुटि पर संसरणजाल का प्रसार—हम आप सबका कितना बड़ा झगड़ा बढ़ गया है? कहाँ तो यह सारे लोक को जानने की शक्ति रखने वाला, अनंत आनंद में मग्न रह सकने वाला आत्मा भगवान है और कहाँ आज यह स्थिति है कि नाना शरीरों में, देहों में जन्म और मरण करना पड़ता है और उस जीवन में अनगिनते दु:खों को भोगना पड़ता है। इतनी दयनीय अवस्था हम आप आत्मावों की क्यों हो गयी, इसका कारण क्या है? कारण बताने चलें। हम लोग कषाय करते हैं इस कारण इतना झगड़ा खड़ा हो गया है। कषाय क्यों करते हो? हम लोगों की जो इच्छा है उसकी पूर्ति नहीं हो पाती है इसलिए कषाय करते हैं। भाई इच्छा क्यों करते हो? अजी इच्छा किए बिना विषयों के साधन भी तो नहीं जुटाये जा सकते। इच्छा करनी पड़ती है, विषयों के साधन जुटाने पड़ते हैं। यह भी क्यों? इस देह को पोषने के लिए और दुनिया में इस देह की इज्जत रखने के लिए, लोग कह दें कि यह भी कोई व्यक्ति है। इतने दो शब्द सुनने के लिये इतनी बड़ी आकुलतावों में पड़ना पड़ता है। यह भी क्यों? ‘यह देह मैं हूँ’ ऐसी बुद्धि हुई है। तो मूल में भूल इतनी है कि हम अपने विशुद्ध स्वरूप को नहीं मान सके कि यह मैं हूँ और इन तत्त्वों से जो भिन्न है, जो उसके लिए कलंकरूप है, मान लिया कि यह मैं हूँ, इस देह में ‘मैं हूँ’ ऐसी श्रद्धा हुई कि एक इस मामूली भूल के ऊपर इतने सारे संकटों की विपदा खड़ी हो गयी है। जन्म-मरण बढ़ते चले जा रहे हैं। शांति के अर्थ यथार्थ श्रद्धा की अनिवार्यता—बतावो भैया ! जगत् के नाना जीवों में से दो चार जीवों को मान लिया कि ये मेरे हैं—मेरी स्त्री है, मेरा पुत्र है, यह भी कैसा पागलपन है? अरे ! जैसे जगत के सब जीव हैं ऐसे ही यह भी हैं। हालांकि इस स्थिति में व्यवस्था करना है, मानना भी पड़ता है पर भीतर श्रद्धा में तो यह बात नहीं रहनी चाहिए कि मेरे तो सब कुछ ये ही हैं। भीतरी श्रद्धा इतनी स्पष्ट होनी चाहिए, जो श्रद्धा साधुवों में स्पष्ट रहती है, योगीश्वरों के स्पष्ट रहती है उतनी विशुद्ध श्रद्धा गृहस्थावस्था में भी होनी चाहिए। करने की बात अलग है। कौन किस अवस्था में कहाँ तक साधना कर सकता है? यह उसकी स्थिति की बात है, किंतु श्रद्धा उतनी ही निर्मल होनी चाहिए जितनी निर्मल योगीश्वरों के होती है। ज्ञानमात्र हम हैं; बड़े-बड़े योगीश्वर भी ज्ञानमात्र हैं। ज्ञान का काम जानने का है। जो बात यथार्थ है उसको हम जानना चाहें तो कौन रोक सकता है। आत्मतत्त्व की कर्म नोकर्म से विविक्तता—भैया ! अपने आत्मस्वरूप का परिज्ञान हुए बिना संसार के संकटों से हम मुक्त नहीं हो सकते। भला क्या कष्ट है सही बात को जानने में? कोई शरीर में वेदना होती है कि रोग बढ़ता है? कुछ भी तो कष्ट नहीं है। अरे ! अपनी विचारधारा तो वस्तु के सही स्वरूप में लगाने की होनी चाहिए। यदि हो सके तो यह सच्चा बड़प्पन कर लें। इस आत्मतत्त्व के कर्म नहीं हैं व इन कर्मों का कारणभूत पौद्गलिक कर्म भी नहीं है। यह मैं आत्मा त्रिकाल निरुपाधिस्वरूप हूँ। प्रत्येक पदार्थ स्वयं के रूप हैं, वे खुद जैसे हैं तैसे ही हैं। प्रत्येक पदार्थ प्यौर, केवल, खालिस रहते हैं। प्यौर का अर्थ भावरूप से पवित्र मान रक्खा है, इस प्यौर का सीधा अर्थ पवित्र नहीं है। खालिस, केवल, वही का वही अर्थ है। चौकी पर किसी पक्षी का वीट पड़ा हो तो आप किसी को आज्ञा देते हैं कि चौकी को पवित्र कर दो, शुद्ध कर दो। शुद्ध करने वाला क्या करेगा? यह करेगा कि चौकी के अलावा जो गैर तत्त्व इस पर लिपटा है उसको अलग कर देगा, धो-धा देगा। लो चौकी शुद्ध हो गयी। इस शुद्ध का अर्थ क्या है? चौकी में चौकी ही रही। चौकी के अलावा किसी चीज का संबंध नहीं रहा, इस ही के मायने शुद्ध करना है। आत्मा को शुद्ध कर लो, इस शुद्ध करने का अर्थ क्या है, आत्मा में आत्मा ही रहो। आत्मा की बात आत्मा में ही रहे। जो गैर बात लग गयी है उसे दूर कर दिया जाय, इसी के मायने आत्मा का शुद्ध करना है। आत्मनिजभाव व आत्मपरभाव—आत्मा में गैर चीज क्या लगी है? यह समझने के लिए आत्मा में आत्मा की चीज क्या हुआ करती है, यह जानना होगा। आत्मा में जो अपनी बात है वह निरंतर रहेगी और एकस्वरूप रहेगी। जो गैर वाली बात है वह नाना रहेगी और कभी रहे कभी न रहे। बस इस ही स्वरूप के आधार पर निर्णय कर लीजिए। आत्मा का स्वरूप क्रोध, मान, माया, लोभ आदि विकारोंरूप रहना है क्या? इसमें घटाव—बढ़ाव होता है, ये क्या सदा रहते हैं? अभी क्रोध हुआ, थोड़ी देर में मान हुआ, माया हुई, लोभ हुआ। ये बदलते रहते हैं, सदा नहीं रहते। ये मेरे स्वरूप नहीं हैं, किंतु ज्ञानस्वभाव एक शुद्ध ज्ञानप्रकाश ये आत्मा में सदा रहते हैं। कोई भी स्थिति हो, आत्मा ज्ञान से शून्य नहीं रहता है, इस कारण ज्ञान तो हमारा धर्म है, किंतु क्रोधादिक भाव अधर्म हैं। हम अधर्म को प्रोत्साहन न दें, अधर्म से दूर होने की भावना रक्खें, धर्म के अभिमुख हों, धर्म को समझें तो इस ही से हमारा विकास होगा। इसमें ही बड़प्पन होगा। आत्मतत्त्व में असहज भावों का अभाव—मुझ आत्मा में कोई उपाधि ही नहीं लगी है, इसलिए शरीर भी मुझमें नहीं है, प्रभु तो व्यक्त ही शरीररहित हैं, कर्मरहित हैं, वे सर्वज्ञ हैं, मन की प्रवृत्ति उनमें नहीं है इस कारण वहाँ चिंता नहीं है। यहाँ भी मेरे स्वरूप में चिंता, शोक का काम नहीं है, ये सब बनाये जाते हैं, मुझमें होते नहीं हैं। कल्पनाएँ करते हैं और बनाते रहते हैं। इसमें औदयिक आदि कोई विभाव नहीं, आर्तध्यान, रौद्रध्यान इस आत्मा में नहीं हैं, धर्मध्यान व शुक्लध्यान भी इसके सहज भाव नहीं हैं। दु:खमयी ध्यान को आर्तध्यान कहते हैं। झूठे मौज के ध्यान को रौद्रध्यान कहते हैं। इष्ट का वियोग होने पर, अनिष्ट का संयोग होने पर, शारीरिक वेदना आने पर, तृष्णा और इच्छा के बढ़ाने पर रौद्रध्यान होता है। ये सब इस मुझ आत्मा में स्वभावरूप नहीं हैं, ये बनावटी हैं। मुग्ध प्राणी हिंसा करते हुए मौज मान रहे हैं। झूठी गवाही देने में मौज मान रहे हैं, किसी की चीज चोरी करने में, अथवा जबरदस्ती छीन लेने में मौज मान रहे हैं, विषयों के साधनों में, परिग्रहों के संचय में खुशी मान रहे हैं। ये सब रौद्रध्यान हैं, ये सब खोटे ध्यान हैं। इन ध्यानों को यह जीव मोह की प्रेरणा बनाकर किया करता है। मुझ आत्मा का स्वरूप इन खोटे ध्यानों का नहीं है।

    अपने परमार्थ कुल की उज्ज्वलता का यत्न—भैया ! अपने कुल की बात को पहिचानो। हमारा कुल है चैतन्यस्वरूप, जिस कुल में बड़े-बड़े तीर्थंकर, पुराण-पुरुष हो गए हैं उस कुल में हम आप अच्छी स्थिति में आये हैं। अपने पुराण-पुरुषों के कुल में विकार में ही जीवन बिताने की परंपरा नहीं रही है। और की बात तो जाने दो, जिन्हें लोग बड़ी अच्छी  वृत्ति बताते हैं दया, परोपकार, धर्मध्यान, पूजन, वंदन ये सब भी मेरे आत्मा में स्वभावत: नहीं हैं। कोई बनावट सुहावनी होती है, कोई बनावट असुहावनी होती है। जहाँ एक भी दोष नहीं रहा उसे निर्वाण कहते हैं। निर्वाण में ही महान् आनंद है। संसार अवस्था में आनंद नहीं है, इस कारण केवल विषय-भोगों के लिए ही अपना जीवन न समझें किंतु धर्मध्यान करके उस ज्ञान की उपासना करके सदा के लिए इन झंझटों से मुक्ति पाने का उद्यम बनाएँ।

निर्वाण की निर्दोषता—जो पुरुष निर्वाण में स्थित है, जिसने पापांधकार का विनाश किया है, जो विशुद्ध है, उस परमब्रह्म में एक भी अवगुण नहीं है। भगवान ज्ञानपुंज का नाम है। हाथ, पैर, मुँह, शकल का नाम भगवान नहीं है। भले ही चूँकि मनुष्य ही भगवान बनते हैं या मनुष्य-देह से भगवत्ता प्राप्त होती है लेकिन वह देह ही स्वयं भगवान नहीं है। उस देह में स्थित पवित्र आत्मा कर्मों का विनाश करके प्रभुता पा गया है, पर प्रभु तो विशुद्ध ज्ञान और आनंद का नाम है, जहाँ रंच भी आकुलता नहीं, जहाँ समस्त विश्व जाननहार ज्ञानप्रकाश होता है ऐसा जो ज्ञानप्रकाश है उसे प्रभु कहते हैं। प्रभुदर्शन का उद्यम—निर्दोष, गुणपुंज प्रभु की पूजा आराधना करना है तो हम भी अपना उपयोग ज्ञानप्रकाशरूप बनाएँ तो हम उनके दर्शन कर सकते हैं। हम मोह-ममतारूप तो अपना चित्त बनाएँ और प्रभु के दर्शन की आशा रक्खें, यह तो बालू में तेल निकालने की तरह है। हम प्रभु के दर्शन करना चाहते हैं तो जैसे प्रभु ज्ञानानंदस्वरूप हैं, हम भी अपनी शक्ति-माफिक व अपनी पदवी-माफिक विकल्पों को दूर करके किसी क्षण आत्मविश्राम लें, मैं ज्ञानमात्र हूँ, आनंदमय हूँ ऐसी बारबार भावना बनाएँ, इस ही और अपना झुकाव बनाएँ तो इस अंतरंग वृत्ति में जो निर्विकल्प स्थिति होगी, उस स्थिति में इस ज्ञानपुंज प्रभु भगवान का दर्शन होगा। प्रभुनैकट्य में संकटों का विघटन—हम मोहियों के निकट बसकर कुछ हस्तगत नहीं कर पायेंगे और इस प्रभुता के निकट रहें तो अनुभव करके देख लो कि बहुत से संकट आपके तुरंत समाप्त हो जायेंगे। जिस प्रभु की चर्चा में ही इतना आनंद बसा है फिर उस प्रभु के ध्यान में जो अनुभव हो जाय उसके आनंद का क्या कहना है? हमारा कर्तव्य है कि इस संसार अवस्था में संतोष न मानें? कितना ही सुख का समागम मिला हो, आत्मीय आनंद जो ज्ञान के अनुभव में प्रकट होता है, उस आनंद के पाने का पुरुषार्थ करो।


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